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केदारनाथ सिंह स्मृति शेष: दिल्ली में ‘चकिया’ जीता एक कवि

हिन्दुस्तानPublished By: Arif Khan
Tue, 20 Mar 2018 01:18 AM
केदारनाथ सिंह स्मृति शेष: दिल्ली में ‘चकिया’ जीता एक कवि

वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह हिंदी के ऐसे र्चुंनदा कवियों में रहे जिनकी रचनाओं का दुनिया की तमाम भाषाओं में अनुवाद हुआ। असाधारण ख्याति के बावजूद शख्सियत ऐसी थी कि आखिरी क्षणों तक जड़ों को नहीं भूले। वह दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए भी गांव चकिया (बलिया) को जीते रहे।

यह सिर्फ संयोग नहीं है कि जब उनके संस्मरणों पर केंद्रित एक पुस्तक प्रकाशित की गई तो उसका नाम भी उनके जन्मस्थान से जोड़कर चकिया से दिल्ली रखा गया। वह जितने गांव के कवि थे उतने ही शहर के भी थे। वह हिंदी में लिखते थे, दुनियाभर में पढ़े जाते थे। लेकिन अपनी मातृभाषा भोजपुरी को उन्होंने हमेशा अपनाए रखा। 

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उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव के एक छोटे से किसान परिवार में जन्मे केदार को ग्रामीण परिवेश के अनुभव सहज ही हासिल हुए। आगे चलकर अध्ययन और अध्यापन के सिलसिले में वह बनारस, गोरखपुर जैसे शहरों से लेकर दिल्ली महानगर तक में रहे। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली आदि अनेक देशों की यात्राएं कीं। लेकिन अपने गांव-घर से जो संवेदना उन्हें मिली थी, उसे महानगर तक पहुंचने के बाद भी उन्होंने कभी नहीं बिसराया, बल्कि और मजबूती से अपनी कविताओं में उतारा।

इससे उनकी कविता में एक ओर ग्रामीण जनजीवन की सहज लय रची-बसी, तो दूसरी ओर महानगरीय संस्कृति के बढ़ते असर के कारण ग्रामीण जनजीवन की पारंपरिक संवेदना में आ रहे बदलाव भी रेखांकित हुए। वास्तव में केदार ने अपनी कविताओं में गांव और शहर के बीच खड़े आदमी के जीवन में इस स्थिति के कारण उपजे विरोधाभास को अपूर्व तरीके से व्यक्त किया। 

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बनारस से खास नाता 
केदारनाथ सिंह का बनारस और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से खास रिश्ता था। आरंभिक शिक्षा को छोड़कर सारी पढ़ाई उन्होंने बनारस में ही की। यहीं उन्हें त्रिलोचन और नामवर्र ंसह जैसे दिग्गज साहित्यकारों का सान्निध्य मिला। जीवन की तरह उनकी कविता में बनारस, उसकी स्मृतियां और छवियां बार-बार प्रकट होती रहीं। 

तीसरा सप्तक के कवि
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने केदार की कविताएं तीसरा सप्तक में संकलित की थीं। तीसरा सप्तक 1960 में छपा था। तीसरा सप्तक में छपने का मतलब एक कवि के रूप में प्रतिष्ठित होना था। हालांकि केदार नाथ सिंह ने 1950 के आसपास लिखना शुरू कर दिया था। उनका पहला कविता संग्रह भी 1960 में ही छपा था। 

त्रिलोचन के ‘शिष्य’
एक कवि के रूप में केदार के विकास में कवि त्रिलोचन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। छठे दशक की शुरुआत में केदार जब पढ़ाई के लिए बनारस में थे, तभी उनका त्रिलोचन से संपर्क हुआ था। त्रिलोचन से न सिर्फ उन्हें कविता की जमीन की समझ हासिल करने में मदद मिली, बल्कि मुक्त छंद में लिखने की प्ररेणा भी मिली। 

खुद को हमेशा माना किसानी परिवेश का आदमी
केदार हमेशा खुद को किसानी परिवेश का व्यक्ति मानते रहे। उन्होंने स्वीकार किया है कि उनकी कविता लोकगीतों के प्रभाव में शुरू हुई। उनका जन्म भोजपुरी इलाके में हुआ था, जहां सहज ही भोजपुरी लोकगीत सुनने को मिले और उनकी एक छाप चेतना पर हमेशा के लिए अंकित हो गई।

चकिया गांव के लिए तो वे बस ‘केदार’ ही थे
वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह का अपने गांव से काफी लगाव था। उन्होंने अपने गांव के नदी-नालों को, खेत-खलिहानों को, पोखरों व तालाबों को न सिर्फ अपनी कविताओं में दर्ज कर पहचान दिलाई। 

अपने गांव चकिया में आते ही केदारजी बचपन के दिनों में खो जाते थे। गांव के 'पंडीजी' उनके बाल सखा तो थे ही, बनारस में उनके छात्र जीवन में सहगामी भी रहे। उनकी व केदारजी की जोड़ी गांव में खूब जमती थी। हंसी-मजाक तो वे अपने चाचाजी के साथ भी कर लेते थे। गांव में आते ही अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध केदारनार्थ ंसह गंवई केदार बन जाते थे। वे गांव में जब भी आते , दरवाजे पर बैठकर गांव-गिराव का हालचाल लेते थे। साथ ही गांव के लोगों को देश-दुनिया की जानकारी से अवगत भी कराते थे। गांव जब भी अपने नदी-नालों को देखेगा, मांझी के पुल को देखेगा, हलवाहों को खेत जोतते देखेगा, तब केदारनार्थ ंसह बहुत याद आएंगे।

मैं वही पूरबिहा हूं
- जन्म 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले स्थित चकिया गांव में 
- शुरुआती पढ़ाई गांव में। इसके बाद बनारस में रहकर परास्नातक तक की पढ़ाई की।  
- 1960 में अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में कविताएं प्रकाशित 
- वाराणसी, गोरखपुर, पडरौना और दिल्ली में अध्यापन किया। 1976 से 1999 तक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में अध्यापन किया। फिर यहां प्रोफेसर एसोसिएट बने। 

प्रमुख कृतियां-

कविता संग्रह : 
अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, ताल्सतॉय और साइकिल, सृष्टि का पहरा

गद्य
मेरे समय के शब्द, कब्रिस्तान में पंचायत, चिट्ठियां कैलाशपति निषाद के नाम, मेरे साक्षात्कार 
-सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, स्पेनी, रूसी, जर्मन, हंगारी, फ्रांसीसी, इतालवी, डच भाषाओं में कविताओं के अनुवाद प्रकाशित। 
-काव्यपाठ के लिए अमेरिका, रूस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, कजाकिस्तान अनेक देशों की यात्राएं। 

सम्मान 
- 2013 का देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार। वह यह पुरस्कार पाने वाले हिंदी के 10वें साहित्यकार हैं। 
- 1989 में अकाल में सारस कृति के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार
- 1993-94 का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान
- 1997 में  उत्तर कबीर तथा अन्य के लिए व्यास सम्मान, साहित्य अकादेमी के महत्तर सदस्य 

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