संस्कार से ही जीवन की सुंदरता, सत्पात्र को दिया दान ही सार्थक
परसियां चातुर्मास्य महायज्ञ में श्रीलक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और पूतना उद्धार का वर्णन किया। उन्होंने संस्कार, शील, सत्य और दया के महत्व पर जोर दिया। बच्चों में संस्कार बोना जरूरी है, और दान का महत्व सत्पात्र को देना बताया।

परसियां चातुर्मास्य महायज्ञ में श्रीकृष्ण बाल लीला व पूतना उद्धार प्रसंग पर डाला प्रकाश कहा, धर्म की बातें करने के साथ जीवन में शील, सत्य, दया और मर्यादा उतारना जरूरी (पेज चार) भभुआ, नगर संवाददाता। परसियां चातुर्मास्य महायज्ञ में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दौरान श्रीलक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और पूतना उद्धार प्रसंग का श्रवण कराया। कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को संस्कार, शील, मर्यादा, सत्य, दया और दान का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की पहचान केवल बाहरी परंपराओं से नहीं, बल्कि जीवन में संस्कार और शील के पालन से होती है। घूंघट और पर्दा हमारी परंपरा का हिस्सा रहे हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल चेहरा छिपाना नहीं, बल्कि मर्यादा और शील की रक्षा करना था। स्वामी जी ने कहा कि आज धर्म और कर्म की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन जीवन में संस्कार, लज्जा और मर्यादा का भाव नहीं है तो जीवन अधूरा रह जाता है। उन्होंने कहा कि संसार की भौतिक सुविधाएं मनुष्य को सुख दे सकती हैं, लेकिन संस्कार और संस्कृति के बिना जीवन की वास्तविक सुंदरता समाप्त हो जाती है। बच्चों को केवल शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बचपन से ही उनके भीतर संस्कारों का बीजारोपण जरूरी है। कथा का उद्देश्य केवल भगवान की लीलाओं का वर्णन करना नहीं, बल्कि उनसे जीवन जीने की सीख प्राप्त करना है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद गोकुल आनंद में डूबा था। इसी दौरान पूतना सुंदर स्त्री का रूप धारण कर गोकुल पहुंची और विष लगे स्तनों से बालक कृष्ण को मारने का प्रयास किया। भगवान ने उसके छल को पहचान लिया और दूध के साथ उसके प्राण भी खींच लिए। पूतना का विशाल रूप धरती पर गिर पड़ा। भगवान ने राक्षसी होने के बावजूद उसे अपनी शरण देकर उद्धार किया। इससे भगवान की असीम करुणा और जीवों के प्रति दया का संदेश मिलता है।
नामकरण और संस्कारों का बताया महत्व
स्वामी जी ने कहा कि सनातन परंपरा में जन्म के बाद विभिन्न संस्कारों का विधान है। नामकरण भी उनमें महत्वपूर्ण है। नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन की दिशा से जुड़ा होता है। बच्चों के नाम शुभ भाव और भगवान के स्मरण से जुड़े होने चाहिए। कन्या को लक्ष्मी का स्वरूप मानकर सम्मान और स्नेह देना चाहिए।
नंद बाबा के दान से मिली लोककल्याण की सीख
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म पर नंद बाबा ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों, संतों और जरूरतमंदों को दान दिया। स्वामी जी ने कहा कि धन तभी सार्थक है, जब उसका उपयोग लोककल्याण और परमार्थ में हो। दान हमेशा सत्पात्र को ही देना चाहिए। गलत व्यक्ति को दिया गया दान अनुचित कार्य में लग सकता है। इसलिए शास्त्रों में सत्पात्र दान को विशेष महत्व दिया गया है।
सत्य, तप, दया और दान धर्म के आधार
उन्होंने कहा कि कलियुग में धर्म के चार आधार सत्य, तप, दया और दान कमजोर पड़ रहे हैं। दान के माध्यम से मनुष्य धर्म और परमार्थ से जुड़ सकता है। किसी जरूरतमंद की सहायता करना, समाजहित में सहयोग देना और लोककल्याण के कार्यों में योगदान देना भी दान का ही भाव है। फोटो : 15 सितंबर भभुआ- 6 कैप्शन : भभुआ प्रखंड के परसियां में चल रहे चातुर्मास्य महायज्ञ के दौरान मंगलवार को जीयर स्वामी जी महाराज से श्रीमद्भागवत कथा सुनते श्रद्धालु।


