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ऑपरेशन ब्लू स्टार के वो सात अहम किरदार, जिन्होंने बदल दी इतिहास की धारा

तीन दिनों तक चले इस ऑपरेशन में कम से कम 300 लोग मारे गए थे। जबकि, 90 से अधिक सैनिकों सहित 700 से अधिक हताहत हुए। वो सात अहम किरदार जिन्होंने भारतीय इतिहास की धारा बदल दी। जानते हैं।

ऑपरेशन ब्लू स्टार के वो सात अहम किरदार, जिन्होंने बदल दी इतिहास की धारा
Gaurav Kalaलाइव हिन्दुस्तान,चंडीगढ़Tue, 06 Jun 2023 08:13 AM
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6 जून को ऑपरेशन ब्लूस्टार की 39वीं वर्षगांठ है। इस दिन भारतीय सेना ने उग्रवादी सिख उपदेशक जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके सशस्त्र समर्थकों को मार गिराया था, जो अमृतसर में स्वर्ण मंदिर परिसर में छिपकर देश विरोधी घटनाओं को अंजाम दे रहे थे।  जरनैल सिंह भिंडरावाले के खात्मे के साथ ऑपरेशन ब्लू स्टार भले ही सफल रहा लेकिन, इसके तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने देश में एक बार फिर उबाल ला दिया था। आज हम जानेंगे ऑपरेशन ब्लू स्टार के उन सात अहम किरदारों के बारे में, जिन्होंने भारतीय इतिहास की धारा बदल दी।

पंजाब के अमृतसर में तीन दिनों तक चले इस ऑपरेशन में कम से कम 300 लोग मारे गए थे। जबकि, 90 से अधिक सैनिकों सहित 700 से अधिक हताहत हुए। इस ऑपरेशन में अकाल तख्त को व्यापक क्षति हुई। सबसे रक्तरंजित लड़ाईयों में एक ऑपरेशन ब्लू स्टार के वो सात अहम किरदार, जिन्होंने पंजाब के हाल के इतिहास में विनाशकारी अध्याय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इंदिरा गांधी: तत्कालीन प्रधान मंत्री, उन्होंने उग्रवादियों को बाहर निकालने के लिए इस ऑपरेशन का आदेश दिया था। उन्हें खुफिया इनपुट मिला था कि अगर जल्द ही कुछ न किया गया तो पंजाब हाथ से निकल जाएगा। इस ऑपरेशन को मंजूरी देने की कीमत इंदिरा गांधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। ऑपरेशन ब्लू स्टार के ठीक चार महीने बाद 31 अक्टूबर 1984 को स्वर्ण मंदिर पर सेना के हमले का बदला लेने के लिए उनके सिख अंगरक्षक बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने उनकी हत्या कर दी थी।

जरनैल सिंह भिंडरावाले: 37 वर्षीय खालिस्तानी उपदेशक, जिन्होंने स्वर्ण मंदिर की किलेबंदी की और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। जरनैल का जन्म फरीदकोट जिले के रोड़े गांव के एक किसान के घर हुआ था। सात भाइयों में सबसे छोटे, भिंडरावाले को सिख मदरसा दमदमी टकसाल भेजा गया था। उनके उग्र भाषणों और "अमृत प्रचार" (बपतिस्मा) आंदोलन ने उन्हें ग्रामीण इलाकों में एक बड़ा अनुयायी बना दिया। 1983 में उन्होंने अपना फोकस स्वर्ण मंदिर में स्थानांतरित कर दिया और ब्लू ऑपरेशन के दौरान मारे गए।

अमरीक सिंह: पूर्व दमदमी टकसाल प्रमुख संत करतार सिंह का बेटा जो जनरैल भिंडरावाले का बेहद खास था। अमरीक सिंह का जन्म भारत-पाकिस्तान सीमा के पास भूरा कोहना गांव में हुआ था। ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष के रूप में वह जल्द ही भिंडरावाले का दाहिने हाथ बन गया। ऑपरेशन ब्लूस्टार में सेना ने अमरीक सिंह को मार गिराया था।

मेजर जनरल शाबेग सिंह: अमृतसर के गांव खियाला से ताल्लुक रखने वाला मेजर जनरल शाबेग सिंह जरनैल भिंडरावाले का गुरु था। यह वह सैन्य अधिकारी था, जिसे गुरिल्ला युद्ध में महारथ हासिल थी। उन्होंने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ एक गुप्त मिलिशिया समूह 'मुक्ति वाहिनी' को प्रशिक्षित किया था। सेवानिवृत्ति के एक दिन पहले उन्हें सेना में वित्तीय गड़बड़ी के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया। इस घटना ने उसके मन में सेना के प्रति नफरत पैदा कर दी। इसके बाद वो भिंडरावाले के साथ जुड़ गया। उसने खालिस्तानी आतंकियों को ट्रेनिंग भी दी। ऑपरेशन ब्लू स्टार में उसकी भी मौत हो गई थी।

जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी: सेना की पश्चिमी कमान के प्रमुख जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी ऑपरेशन ब्लूस्टार के मास्टरमाइंड थे। कहा जाता है कि वह एक दिन में उग्रवादियों को बाहर निकालने के लिए आश्वस्त थे। एक घातक गलत अनुमान जिसके कारण सिखों के सबसे पवित्र धर्मस्थल पर सेना के हमले के विनाशकारी परिणाम हुए। इस ऑपरेशन के बाद जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी सेना प्रमुख भी बने।

मेजर जनरल कुलदीप सिंह बराड़: दून स्कूल के एक पूर्व छात्र मेजर कुलदीप सिंह बराड़ उस वक्त मेरठ स्थित 9 डिवीजन की कमान संभाल रहे थे। ऑपरेशन ब्लू स्टार के लीड हीरो कुलदीप सिंह बराड़ ही थे।  उन्हें दो दिन पहले इस ऑपरेशन को लीड करने के लिए फोन आया था। सेवानिवृत्ति के बाद एक किताब “ऑपरेशन ब्लूस्टार: द ट्रू स्टोरी” में मेजर जनरल कुलदीप सिंह बराड़ लिखते हैं कि ऑपरेशन "सबसे दर्दनाक था। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह आवश्यक था, इसलिए अंजाम दिया गया।

जनरल ए एस वैद्य: ऑपरेशन ब्लू स्टार की योजना बनाने वाले जनरल ए एस वैद्य बाद में सेना प्रमुख भी बने। उन्होंने स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर रहे आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लूस्टार की पूरी निगरानी की। उन्होंने दावा किया था कि इस ऑपरेशन में एक भी मौत नहीं होगी लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया। सेवानिवृत्ति के महीनों बाद अगस्त 1986 में पुणे के एक बाजार से घर जाते समय दो सिख आतंकवादियों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी।

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