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सिर्फ आडवाणी ही नहीं, पाकिस्तान में जन्मी इस शख्सियत को भी मिला है भारत रत्न; क्या रहा योगदान

भारत के सर्वोच्च सम्मान की बात करें तो पाकिस्तान में जन्मी शख्सियों में सिर्फ लाल कृष्ण आडवाणी को ही नहीं बल्कि खान अब्दुल गफ्फार खान को भी भारत रत्न से नवाजा जा चुका है।

सिर्फ आडवाणी ही नहीं, पाकिस्तान में जन्मी इस शख्सियत को भी मिला है भारत रत्न; क्या रहा योगदान
Himanshu Tiwariलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीSat, 03 Feb 2024 03:04 PM
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भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता और राम मंदिर आंदोलन के पोस्टर ब्वॉय रहे लाल कृष्ण आडवाणी को भारत रत्न से नवाजा जाएगा। आडवाणी का जन्म अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। भारत के सर्वोच्च सम्मान की बात करें तो पाकिस्तान में जन्मी शख्सियों में सिर्फ लाल कृष्ण आडवाणी को ही नहीं बल्कि खान अब्दुल गफ्फार खान को भी भारत रत्न से नवाजा जा चुका है। सीमांत गांधी, बाचा खान, बादशाह खान के नाम से मशहूर खान अब्दुल गफ्फार खान ने महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते पर देश की आजादी में अपना योगदान दिया। एक समर्पित मुस्लिम होकर खान अब्दुल गफ्फार खान पूरे जीवन पर्यंत अंग्रेजों और पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ एक अहिंसक आंदोलन का नेतृत्व किया और भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदू-मुस्लिम सुलह के हिमायती बने रहे।

खान अब्दुल गफ्फार खान पहले ऐसे विदेशी शख्स थे जिन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था। खान अब्दुल गफ्फार खान खैबर पख्तूनख्वा से ताल्लुक रखते थे, जिसे पहले नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (NWFP) के रूप में जाना जाता था। वह एक राजनीतिक और आध्यात्मिक नेता थे। उन्होंने पैगंबर मुहम्मद के मार्ग पर चल अहिंसा के प्रति शपथ लेते हुए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

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क्या रहा खान अब्दुल गफ्फार खान का योगदान
आजादी के आंदोलन के दौरान उन्हें 'सीमांत गांधी' के नाम से भी जाना जाता था। महात्मा गांधी के विचारों उनका रसूख और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस से खान अब्दुल गफ्फार खान का ताल्लुक रखना, उनके 'सीमांत गांधी' के नाम के लिए जिम्मेदार है। 1910 में 20 साल की उम्र में खान अब्दुल गफ्फार खान ने अपने होमटाउन उस्मान जई में एक स्कूल खोला, जिसमें ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह करने वाली महिलाओं और बच्चों को शिक्षा प्रदान की जाती थी। समाज में विशेष रूप से अपने समुदाय की दयनीय स्थिति को देखने के बाद, खान अब्दुल गफ्फार खान ने 1921 में अफगान रिफॉर्म सोसायटी की स्थापना की। जिसके बाद समुदाय के सामाजिक उत्थान के लिए पश्तून असेंबली नाम से युवा आंदोलन चलाया गया।

खुदाई खिदमतगार बन लिया अंग्रेजों से लोहा
1929 में अंग्रेजों के खिलाफ एक विद्रोह में खान अब्दुल गफ्फार खान ने खुदाई खिदमतगार का गठन किया, जो एक अहिंसक उपनिवेशवाद विरोधी प्रतिरोध आंदोलन था। जिसने एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और एकजुट राष्ट्र की मांग की। उनके इस इस समूह को लाल कुर्ती दल भी कहा जाता था। देखते ही देखते भारतीयों में खुदाई खिदमतगारों की लोकप्रियता बढ़ी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आंदोलन को दबाने के प्रयास में खुदाई खिदमतगारों को कुछ सबसे क्रूर उत्पीड़नों का शिकार होना पड़ा।

महात्मा गांधी के पल-पल के साथी थे खान अब्दुल गफ्फार खान
23 अप्रैल, 1930 को गांधी के साथ नमक सत्याग्रह के दौरान खान अब्दुल गफ्फार खान को गिरफ्तार कर लिया गया था। पेशावर के किस्सा ख्वानी में उनकी गिरफ्तारी के विरोध में खुदाई खिदमतगार इकट्ठा हुए, अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में निहत्थे प्रदर्शनकारियों को मशीनगनों से मार डाला। खुदाई खिदमतगार का 1930-31 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान कांग्रेस में विलय हो गया, लेकिन एक स्वयंसेवक बल के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाए रखी।

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जिन्ना राज को बताया भेड़िया
खान अब्दुल गफ्फार खान ने भारत के विभाजन का स्पष्ट विरोध किया था। वह अपने लोगों को पाकिस्तान में धकेले जाने से परेशान थे, उन्होंने कांग्रेस को यह कहते हुए फटकार लगाई कि "आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया है"। बंटवारे के बाद खान अब्दुल गफ्फार खान पाकिस्तान चले गए क्योंकि उनका प्रांत नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस  पाकिस्तान का हिस्सा होने वाला था। पाकिस्तान की तरफ से 'देशद्रोही' करार दिए जाने के बाद और अपने प्रांत और लोगों के लिए एक बेहतर सौदे की उनकी लड़ाई जारी रही। अपनी लड़ाई को लेकर वह नियमित रूप से पाकिस्तानी सरकार के द्वारा गिरफ्तार किए जाते रहे।

साल 1988 में पेशावर के घर में नजरबंद रहने के दौरान खान अब्दुल गफ्फार खान की स्ट्रोक की वजह  मृत्यु हो गई। उन्हें जलालाबाद, अफगानिस्तान में अपने घर में दफन कर दिया गया। खान अब्दुल गफ्फार खान अपने जीवन पर्यंत ईमानदारी, दया और अहिंसा साथ लेकर चले। 

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