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Hindi News देशकोई भी ऐरा-गैरा बीच में आकर विलंब क्षमा याचिका दायर नहीं कर सकता, SC ने क्यों कहा ऐसा?

कोई भी ऐरा-गैरा बीच में आकर विलंब क्षमा याचिका दायर नहीं कर सकता, SC ने क्यों कहा ऐसा?

Supreme Court News: अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण को मंजूरी दी जाती है, तब तो कोई भी आदमी मुकदमे की बहाली के लिए विलम्ब क्षमा याचिका दायर करने लगेगा

कोई भी ऐरा-गैरा बीच में आकर विलंब क्षमा याचिका दायर नहीं कर सकता, SC ने क्यों कहा ऐसा?
Pramod Kumarलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीThu, 09 May 2024 10:00 PM
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में महाराष्ट्र के एक ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें भूमि अधिग्रहण के मुकदमे की बहाली के लिए किसी तीसरे पक्ष को विलम्ब क्षमा याचिका दायर करने की अनुमति दी गई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी बाद में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे अब खारिज कर दिया है।

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने विजय लक्ष्मण भावे (मृतक) बनाम पी एंड एस निर्माण प्राइवेट लिमिटेड के मामले में यह फैसला सुनाया है। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण को मंजूरी दी जाती है, तब तो कोई भी टॉम, डिक और हैरी टाइप का आदमी मुकदमे की बहाली के लिए विलम्ब क्षमा याचिका दायर करने लगेगा। कोर्ट ने कहा कि ऐसी अनुमति किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती। भले ही वह उसी तरह के मुकदमे में पक्षकार ही क्यों न हो।

दो जजों की पीठ ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली महाराष्ट्र सरकार की अपील अर्जी पर सुनवाई कर रही थी। महाराष्ट्र राज्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट को तीसरे पक्ष के आवेदन पर विचार नहीं करना चाहिए था क्योंकि वह कार्यवाही से संबंधित नहीं था, खासकर जब नवंबर 2019 से ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक लंबित आवेदन पहले से ही प्रक्रिया में था।

इसके जवाब में प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम ने तर्क दिया कि तीसरे पक्ष के आवेदक ने वास्तविकता में साल 2009 में ही बिक्री के लिए एक गैर-पंजीकृत समझौते के कारण मुकदमे में पक्षकार होने का अधिकार हासिल कर लिया था। इस प्रकार, देरी के लिए माफी का आवेदन दायर करना उनके लिए उचित है क्योंकि मूल वादी उस मामले में आगे नहीं बढ़ रहे थे।

प्रतिवादी द्वारा बिक्री के समझौते पर दिए गए तर्क पर टिप्पणी किए बिना पीठ ने कहा कि विलंब के आवेदन को अनुमति देने वाला ट्रायल कोर्ट का आदेश कानून की दृष्टि से टिकने योग्य नहीं है। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि मूल वादी के कानूनी उत्तराधिकारियों का भी विलंब क्षमा आवेदन  7 नवंबर 2019 से लंबित है। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि प्रतिवादी नंबर 2 और 3 द्वारा आवेदन दायर करने की तारीख से दो साल की अवधि के बाद प्रतिवादी नंबर 1 द्वारा  दायर आवेदन पर ट्रायल कोर्ट ने विचार क्यों किया और ऐसी क्या क्या मजबूरी थी?