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27 जनवरी, 2020|5:55|IST

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निर्भया मामले के बाद भी नहीं सुधरे हालात, अस्पतालों में मेडिकल के लिए भटकती हैं रेप पीड़िता

यौन उत्पीड़न के मामलों में सबूत इकट्ठा करने लिए दिल्ली के सभी अस्पतालों में विशेष फॉरेंसिक किट उपलब्ध नहीं होती हैं। इस कारण पीड़िताओं को अस्पतालों  के चक्कर काटने पड़ते हैं। जस्टिस उषा मेहरा की अध्यक्षता में बने आयोग की सिफारिशों के बाद सभी अस्पतालों को विशेष फॉरेंसिक किट रखने के निर्देश दिए गए थे, ताकि सबूत एकत्र करने के लिए पीड़िता को दूसरे अस्पताल में न भटकना पड़े। इनका  पालन नहीं हो पा रहा है। कई अस्पतालों में किट समय पर उपलब्ध नहीं  कराई जाती है। वहीं, कई बार डॉक्टरों की कमी की वजह से पीड़िता को दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ता है।

महर्षि वाल्मीकि अस्पताल में हमेशा नहीं होती किट : महर्षि वाल्मीकि अस्पताल के प्रसूति विभाग के एक डॉक्टर ने बताया कि अस्पताल में हमेशा फॉरेंसिक किट उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में कई बार इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में रात को जब यौन शोषण का कोई मामला आता है तो किट के अभाव में पीड़िता को दूसरे अस्पताल रेफर करना पड़ता है। डॉक्टरों ने बताया कि यौन उत्पीड़न की जांच और सबूत एकत्र करने के लिए गायनेकोलॉजी के डॉक्टर के अलावा एनेस्थेसिया के डॉक्टर का होना भी जरूरी होता है।

चाचा नेहरू अस्पताल में उपलब्ध है किट : बच्चों के अस्पताल चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में फॉरेंसिक किट उपलब्ध है। अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर बीएल शेरवाल ने बताया कि उनके अस्पताल में महीने में औसतन एक दुष्कर्म का मामला आता है। हम तुरंत सबूत एकत्र करते हैं और पीड़िता को चिकित्सीय मदद उपलब्ध कराते हैं। शेरवाल ने बताया कि अस्पताल में डॉक्टरों की टीम को इसका प्रशिक्षण भी दिया गया है। उन्होंने कहा कि उनके अस्पताल में वन स्टॉप सेंटर भी बनाया जाना है। इसकी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।

डॉक्टर नहीं होने पर पीड़िता को रेफर किया
बवाना बीते जून में चार साल की बच्ची से दुष्कर्म का मामला सामने आया था। पीड़िता को नजदीकी महर्षि वाल्मीकि अस्पताल पहुंचाया गया। अस्पताल में प्रसूति रोग विभाग की डॉक्टर तो मौजूद थीं, लेकिन एनेस्थीसिया के डॉक्टर के न होने से बच्ची को चिकित्सीय सहायता नहीं मिल सकी। ऐसे में उसे बाबा साहेब अंबेडकर अस्पताल रेफर कर दिया था। पीड़ित बच्ची की मेडिकल जांच के लिए कुछ और टेस्ट की जरूरत थी, इसलिए मरीज को डॉ. बीएसए अस्पताल रेफर किया, जो 8-10 किलोमीटर दूर है। मेडिकल जांच में देरी से बच्ची की हालत खराब हो गई थी। इस पर लोग भड़क गए और अस्पताल में तोड़फोड़ कर दी। 

मेडिकल के दौरान पुलिस ने चांटे मारे
वर्ष 2017 में मुरादनगर की युवती के साथ तीन युवकों ने गैंगरेप किया गया था। पुलिस पीड़िता को संयुक्त अस्पताल में मेडिकल जांच के लिए ले गई थी। मेडिकल के दौरान महिला डॉक्टर और महिला पुलिसकर्मी कक्ष में थी। अधिवक्ता शबनम खान ने बताया कि वह भी वहां मौजूद थीं। कक्ष से पीड़िता के रोने की आवाज आ रही थी, दरवाजा खुलने पर पीड़िता ने बताया कि उसे पुलिसकर्मी ने चांटे मारे। डॉक्टर और पुलिसकर्मी घटना को लेकर ताने मार रहे थे। 

परिजन मेडिकल कराने ले गए, नहीं मिली एंबुलेंस
गांधी नगर स्थित एक स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची के साथ 10 सितंबर 2017 को स्कूल के सफाई कर्मचारी ने दुष्कर्म किया। बच्ची ने घर जाकर परिजनों को दुष्कर्म की घटना की जानकारी दी। इस मामले में पुलिस अधिकारियों ने बच्ची का मेडिकल कराने के लिए परिजनों को भेजा। अस्पताल में मेडिकल किट न होने पर बच्ची को चाचा नेहरू अस्पताल से लोक नायक अस्पताल रेफर किया गया। अस्पताल प्रशासन ने बच्ची को लेकर जाने के लिए एंबुलेंस उपलब्ध नहीं करवाई। इसके चलते परिजन चाचा नेहरू अस्पताल से बच्ची को बाइक पर लेकर लोकनायक अस्पताल गए। जहां बच्ची का उपचार शुरू किया गया। तब स्वास्थ्य विभाग ने दोषी अधिकारियों पर सस्पेंड कर दिया था। आरोपी सफाई कर्मचारी को पुलिस ने जेल भेज दिया है। 

ये बातें भी जरूरी
* पीड़िता की निजता के लिए दिशानिर्देशों के अनुसार आवश्यक उपकरणों से युक्त विशेष कक्ष बनाना जरूरी है। 
* चिकित्सकीय जांच के दौरान कक्ष में डॉक्टर के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति मौजूद नहीं होगा। 
* यदि डॉक्टर पुरुष है तो महिला सहायक की मौजूदगी जरूरी है। 
* नए दिशा निर्देशों के तहत पीड़िता को वैकल्पिक कपड़े और हालात की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सुबूत जुटाने का सुगम तरीका अपनाना होगा। 
* डॉक्टरों और चिकित्सा स्टाफ को प्रशिक्षण देना आवश्यक होगा।

गाजियाबाद में नहीं हो रहा गाइडलाइन का पालन
जिले के सरकारी अस्पतालों में दुष्कर्म पीड़िताओं के मेडिकल से जुड़े नियमों का पूरी तरह से पालन नहीं होता है। मेडिकल के लिए घंटों इंतजार कराया जाता है। कभी पैथोलॉजिस्ट न होने का हवाला देकर लौटा दिया जाता है तो कभी महिला पेरामेडिकल स्टाफ न होने की बात कही जाती है।

जरूरी उपकरण होने चाहिए
फॉरेंसिक किट में सबूत इकट्ठा करने के लिए आवश्यक उपकरण के साथ लिए जाने वाले नमूनों की पूरी सूची होनी चाहिए। किट को फॉरेंसिक लैब भेजने से पहले सील करना चाहिए।  किट में मेडिकल जांच के दौरान यौन उत्पीड़न के सबूत एकत्र और संरक्षित रखने के लिए ये चीजें होनी आवश्यक हैं। 

1. पीड़िता को जरूरी जानकारी देना।
2. सबूत एकत्र करने के लिए फॉरेंसिक बैग और शीट।
3. होठ, गाल, जांघ, लिंग, योनि और गुदा से फ्लूइड एकत्र करने के लिए स्वैब होना चाहिए।
4. रक्त के नमूने एकत्र करने वाली डिवाइस।
5. पीड़ित के बाल और शरीर से फाइबर एकत्र करने के लिए विशेष कंघा।
6. ग्लास की साफ स्लाइडें।
7. पीड़िता के कपड़े, बाल और रक्त के नमूने संरक्षित रखने के लिए लिफाफे।
8. नाखून के नीचे जमा गंदगी के नमूने लेने के लिए नेल प्रिक।
9. शरीर से शारीरिक निशान लेने के लिए सफेद शीट।
10. डॉक्यूमेंटेशन फॉर्मं
11. पीड़िता को मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत रखने के लिए काउंसलिंग की सुविधा उपलब्ध कराना। ट्रामा के बाद तनाव झेल रही पीड़िताओं को मनोचिकित्सीय थैरेपी उपलब्ध कराना।
12. पीड़िता को पर्याप्त चिकित्सीय देखरेख और सुविधा उपलब्ध कराना।
13. राज्य या जिले के कानूनी सेवा प्राधिकरण की ओर से पीड़िता को कानूनी मदद उपलब्ध कराना।
14. पीड़िता को उसकी इच्छानुसार जांच के बाद उसके परिजनों से मिलवाना।
15. सरकारी और निजी दोनों अस्पतालों में जांच की रिपोर्ट जल्द देना। रिपोर्ट में 24 घंटे से अधिक देरी न होना।
16. जांच के नतीजे पीड़िता की अनुमति होने पर उसे उपलब्ध कराना।
17. मेडिकल जांच के बाद मजिस्ट्रेट के सामने 164 का बयान दर्ज कराना। 

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  • Web Title:nirbhaya case Delhi Hospitals Do Not have Proper Medical For Rape Victim