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श्रद्धांजलि: गुमनामी बाबा के कमरे से मिली नेताजी की तस्वीरें और वर्दी

netaji subhas chandra bose

गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत के सामने आजादी हासिल करना सबसे बड़ी चुनौती थी। इस चुनौती का सामना करने लिए कई योद्धा तैयार हुए, उन्होंने अपनी कुर्बानी भी थी। इन योद्धाओं ने अंतिम सांस तक देशहित सोचा और अंग्रेजों से लोहा लिया। इस फेहरिस्त में एक नाम बहुत ही फख्र से लिया जाता है। वो सख्स जिसने देश हित के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया, वो सख्स जिसने देशहित के लिए आजाद हिन्द फौज बना दी. हम बात कर रहे हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस की। आज नेताजी की पुण्यतिथि है...

दरअसल नेताजी के देहांत को लेकर अभी तक संशय बना हुआ है। लेकिन एक सरकारी जानकारी के मुताबिक नेताजी का देहांत 18 अगस्त 1945 को ताइवान के नजदीक हुई एक हवाई दुर्घटना में हुआ। भारत सरकार और इतिहास की कुछ किताबों ने इस हवाई दुर्घटना को ही नेताजी के देहांत का कारण माना। लेकिन अहम बात यह रही कि इस दुर्घटना के बाद वहां से नेताजी का शव बरामद नहीं किया जा सका। बताया जाता है नेता जी को अंतिम बार टोक्यो हवाई अड्डे पर ही देखा गया था और वे वहीं से उस विमान में बैठे थे।

नेताजी से जुड़ा एक अहम तथ्य 16 सितंबर 1985 को फैजाबाद शहर से मिला। शहर के सिविल लाइन्स इलाके में स्थित राम भवन में एक बाबा का लम्बे समय से रहते थे। वहां के स्थानीय लोगों को बाबा से जुड़ी कोई बात नहीं पता था। लेकिन जब उनकी मृत्यु हुई और अंतिम संस्कार के बाद कमरे को खंगाला गया तब वहां से कई हैरान कर देने वाली चीजें देखने को मिलीं। उस कमरे में नेताजी की पारिवारिक तस्वीरें, आजाद हिंद फौज की वर्दी और अखबारों की कटिंग्स मिलीं, जो कि सीधे तौर पर नेताजी से जुड़ीं थीं। इन दस्तावेजों के आधार पर कई लोगों ने उन्हें बाबा नकारते हुए नेताजी माना। हालांकि इस पर किसी भी तरह का सरकारी बयान जारी नहीं हुआ।

नेताजी के जीवन की बात करें तो उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में हुआ। वो एक बंगाली परिवार से संबंध रखते थे। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस था। जबकि उनकी मां का नाम प्रभावती था। नेताजी समेत उनकी 14 संतानें थी। सुभाष चंद्र उनकी 9वीं संतान थे।

नेताजी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कटक से प्राप्त की। वो उच्च शिक्षा के लिए वे कलकत्ता चले गए और वहां के अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे इण्डियन सिविल सर्विस (ICS) की तैयारी के लिए इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान हासिल किया। 

इसके बाद 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों की बातें सुनकर नेताजी भारत लौट आए और उन्होंने सिविल सर्विस छोड़ दी। इसके बाद नेताजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए था। यहां से उन्होंने भारत को आजाद कराने की मुहिम से जुड़े। इस वजह से उन्हें ब्रिटिश शासन काल में कई बार जेल जाना पड़ा। हालांकि वो किसी से डरे नहीं और अंत तक जुटे रहे।

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