एनसीपीआई बन सकती है एनडीए की दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी
लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी का हो रहा इंतजार नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। तृणमूल

नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। टीएमसी के बागी सांसदों द्वारा एनसीपीआई में विलय का ऐलान किए जाने के बाद यह दल लोकसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का सबसे बड़े सहयोगी बनने की स्थिति में पहुंच सकता है। बागी सांसदों ने संसद में एनडीए को समर्थन देने का भी फैसला किया है। यदि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा इस विलय को मान्यता मिल जाती है, तो एनसीपीआई के पास 20 सांसद हो जाएंगे। इसके साथ ही वह लोकसभा की पांचवी सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी और भाजपा के बाद एनडीए की दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी होगी। साथ ही बंगाल में लोकसभा सीट के लिहाज से ये सबसे बड़ी पार्टी होगी। हालांकि, जानकारों का कहना है कि असली तस्वीर जुलाई में सामने आएगी, जब बागियों का समूह तृणमूल कांग्रेस पर दावे की कवायद शुरू कर सकता है।
बागी सांसदों का समर्थन
गौरतलब है कि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों के समर्थन का दावा करने वाले बागी गुट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की भी मांग की है। दूसरी ओर, टीएमसी संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी ने इस गुट को मान्यता नहीं देने की अपील की है।
दलबदल विरोधी कानून
जानकारों का मानना है कि बागी सांसदों ने दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए विलय का रास्ता चुना है। कानून के तहत किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सांसद यदि किसी अन्य पार्टी में शामिल होते हैं, तो उसे वैध विलय माना जा सकता है। इसी कारण एनसीपीआई में विलय को कानूनी रूप से सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है। यदि यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में खास प्रभाव नहीं छोड़ पाने वाली एनसीपीआई अचानक राष्ट्रीय राजनीति में एक अहम शक्ति बनकर उभर सकती है और एनडीए के भीतर उसका कद कई पुराने सहयोगी दलों से बड़ा हो जाएगा।
एनडीए सीटों की गणना
लोकसभा में एनडीए के पास 292 सीटें
केंद्र में एनडीए के सहयोगी दलों की सीटों की बात करें तो 2024 के लोकसभा चुनावों में, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने 543 में से कुल 292 सीटें जीती थीं। इसमें भाजपा के पास 240 सीटें हैं, जबकि बाकी 52 सीटें एनडीए के सहयोगी दलों के पास हैं। इनमें तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी ) के पास 16, जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू ) के पास 12, शिवसेना (शिंदे गुट) 7 , लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) 5, जनता दल (सेक्युलर) 2 , राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी ) को पास भी 2 सीटें हैं। वहीं, चुनाव में एनडीए के छोटे सहयोगी दलों, जैसे आरपीआई, अपना दल, आजसू आदि ने कुल मिलाकर 6 सीटें जीती थीं। इनमें से अपना दल (सोनेलाल), आजसू पार्टी और आरपीआई (आठवले) को 1-1 सीट मिली थी।
पार्टी की स्थापना
कुंडू दंपति ने रखी पार्टी की नींव
चुनाव आयोग ने वर्ष 2023 में एनसीपीआई को गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत किया था। पार्टी का रजिस्टर्ड मुख्यालय हावड़ा जिले के बनिपुर (हाटगछा) में स्थित है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उत्तिया कुंडू और उनकी पत्नी शेवली (शिउली) कुंडू कोषाध्यक्ष हैं। दोनों पति-पत्नी लंबे समय से स्थानीय स्तर पर सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे हैं। शेवली कुंडू दो महत्वपूर्ण संगठनों की निदेशक भी हैं। बताया जाता है कि एनसीपीआई की नींव स्थानीय समस्याओं, युवाओं के रोजगार, महिलाओं के सशक्तिकरण और क्षेत्रीय विकास को लेकर उठाए गए मुद्दों पर रखी गई थी। मजे की बात यह है कि यह पार्टी राजनीतिक दलबदल की भी मुखालफत करती रही है।
चुनावी प्रयोग
सबकी जमानत हुई थी जब्त
एनसीपीआई ने अपना पहला चुनावी प्रयोग 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में किया। बंगाल में पंजीकृत होने के बावजूद पार्टी ने त्रिपुरा के आदिवासी बहुल और दूरदराज के इलाकों पर विशेष फोकस किया। सात सीटों पर उम्मीदवार उतारे गए, लेकिन चार के नामांकन रद्द हो गए। केवल दो सीटों पर पार्टी के चुनाव चिह्न ‘सात किरणों वाला पेन निब’ पर वोटिंग हुई। पार्टी उम्मीदवारों को बहुत कम वोट मिले और सबकी जमानत जब्त हो गई थी ।
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