सारंडा में मिसिर बेसरा और आकाश के बीच मतभेद के बाद हुआ था नक्सलियों में बिखराव
भाकपा (माओवादी) के ईस्टर्न रिजनल ब्यूरो में मिसिर बेसरा और असीम मंडल के बीच विवाद के बाद नक्सली दस्तों में बिखराव शुरू हुआ। आकाश ने संगठन को फिर से खड़ा करने के प्रयास में संसाधनों की कमी और पुलिस दबाव का सामना किया। 22 जनवरी को सुरक्षा ऑपरेशन के बाद दोनों नेताओं के बीच मतभेद बढ़ गए।

भाकपा (माओवादी) के ईस्टर्न रिजनल ब्यूरो सारंडा में पोलित ब्यूरो मेंबर मिसिर बेसरा और सेंट्रल कमेटी मेंबर असीम मंडल उर्फ आकाश के बीच हुए विवाद के बाद ही नक्सली दस्तों में बिखराव शुरू हुआ। सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश के रिजनल ब्यूरो छोड़ने और उसके मूवमेंट को लेकर जांच एजेंसियों के सामने कई अहम जानकारियां आई हैं। सूत्रों के अनुसार, पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा के साथ रणनीति को लेकर मतभेद के बाद ही आकाश ने सारंडा छोड़ दिया था। इसके बाद वह अपने आठ सहयोगियों के साथ सरायकेला, दलमा और पश्चिम बंगाल के कांकड़ाझोर-झाड़ग्राम इलाके में सक्रिय होकर संगठन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश में जुट गया था, लेकिन संसाधनों की कमी, लगातार पुलिस दबाव और संगठन के भीतर अविश्वास के कारण उसकी योजना सफल नहीं हो सकी।
ईस्टर्न रिजनल ब्यूरो बना था सारंडा
सूत्रों के अनुसार वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल के लालगढ़ आंदोलन के कमजोर पड़ने के बाद माओवादी संगठन ने अपना फोकस सारंडा क्षेत्र पर केंद्रित किया था। उस समय पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा और बिहार के लिए सारंडा को महत्वपूर्ण ईस्टर्न रिजनल ब्यूरो के रूप में विकसित किया गया। पारसनाथ के बाद संगठन की बड़ी गतिविधियां सारंडा से संचालित होने लगी थीं। इसी दौरान आकाश का दस्ता भी सारंडा में सक्रिय था। यह था मतभेद का कारण इसी साल के 22 जनवरी को सारंडा में सुरक्षा बलों के बड़े ऑपरेशन और शीर्ष 2.35 करोड़ के माओवादी पतिराम मांझी उर्फ तूफान उर्फ अनल दा के मारे जाने के बाद संगठन को भारी नुकसान हुआ। इस दौरान हुई मुठभेड़ों में आकाश के दस्ते का सक्रिय सदस्य समीर सोरेन समेत 22 माओवादी मारे गए।
बताया जाता है कि सारंडा में संगठन को मजबूत करने
सूत्रों का कहना है कि इसी घटना के बाद आकाश और मिसिर बेसरा के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गया। बताया जाता है कि सारंडा में संगठन को मजबूत करने और जनाधार बढ़ाने को लेकर दोनों नक्सली कमांडरों के बीच पहले सहमति बनी थी, लेकिन आकाश का आरोप था कि मिसिर बेसरा के नेतृत्व में इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई। दूसरी ओर लगातार बढ़ते सुरक्षा बलों के अभियान से संगठन को नुकसान उठाना पड़ रहा था। इसके बाद मिसिर बेसरा संगठन के उस इलाके से अलग हो गया। वहीं, उसके दस्ते के काफी सदस्यों के आत्मसमर्पण और कुछ लोगों के पुलिस के संपर्क में आने से आकाश का भरोसा मिसिर के सहयोगियों पर भी कमजोर पड़ गया। इसी कारण दोनों नेताओं के बीच दूरी बढ़ती चली गई।
आकाश ने बदला कोरिडोर
सूत्रों के अनुसार, इसके बाद आकाश आठ साथियों के साथ सरायकेला के दलमा जंगल होते हुए बूढाबूढी पहाड़ से होकर झांटीझरना में पड़ाव के बाद पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम जिले के कांकड़ाझोर इलाके में पहुंच गया। वर्ष 2000 के दशक में कांकड़ाझोर और आसपास के जंगल माओवादियों के प्रभाव वाले क्षेत्र माने जाते थे। आकाश को उम्मीद थी कि लंबे अंतराल के बाद बंगाल में संगठन को फिर से जनसमर्थन मिल सकता है और नए सिरे से विस्तार किया जा सकेगा।
राहूल से सम्पर्क टूटा
बताया जाता है कि पश्चिम बंगाल में आत्मसमर्पण कर चुके सांसद हत्याकांड के आरोपी रहे राहुल पाल के माध्यम से भी आकाश तक आत्मसमर्पण का प्रस्ताव पहुंचाया गया था, लेकिन उसने इसे स्वीकार नहीं किया। उसने अपने साथियों से कहा था कि 14 वर्षों में बंगाल की परिस्थितियां बदल चुकी हैं और संगठन को फिर से खड़ा करने का अवसर मिल सकता है।
ना हथियार है ना पैसा
संगठन को विस्तार देने के लिए आकाश ने अपने दस्ते को दो हिस्सों में बांट दिया। एक टीम में आकाश, सचिन सहित छह सदस्य थे, जबकि दूसरी टीम में मदन महतो, बीरेन उर्फ सागर और मीरा समेत अन्य सदस्य शामिल थे। दोनों टीमों ने अलग-अलग इलाकों में चुनिंदा ग्रामीणों से संपर्क कर उन्हें संगठन से जोड़ने का प्रयास शुरू किया। आकाश अपने पुराने विश्वस्त संपर्कों को बुलाकर क्षेत्र की स्थिति की जानकारी लेता था। इसके अलावा शहरी नेटवर्क और कथित अर्बन नेटवर्क से भी संपर्क स्थापित कर युवाओं को जोड़ने की कोशिश की गई। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की कमी थी। संगठन के पास न पर्याप्त फंड था और न ही हथियार एवं गोला-बारूद।
लेवी का रास्ता भी हुआ बंद
सूत्र बताते हैं कि फंड की कमी दूर करने के लिए संगठन ने व्यवसायियों और प्रतिष्ठानों से लेवी मांगनी शुरू की। इसी क्रम में बोटा के पेट्रोल पंप समेत कई लोगों को पत्र और फोन के जरिए रकम की मांग की गई। इन घटनाओं की जानकारी पुलिस तक पहुंच गई और कई मामले दर्ज हुए। इसके बाद पुलिस ने तकनीकी निगरानी और खुफिया तंत्र को और मजबूत कर दिया। लगातार मिल रही सूचनाओं और बढ़ते दबाव के कारण ही आकाश के दलमा से कांकड़ाझोर की ओर शिफ्ट होने की बात सामने आई। जांच एजेंसियां अब भी उसके नेटवर्क और सहयोगियों से जुड़े इन पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं।


