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ऐसा मुस्लिम नेता जिसने संभाली थी हिंदू महासभा की कमान, आज भी पूरे पाकिस्तान में चलता है उनका दवाखाना

हकीम अजमल खान ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने ने केवल इलाज को लेकर बल्कि आजादी के संघर्ष को लेकर भी नाम किया। वह कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। वहीं उन्होंने हिंदू महासभा की भी कमान संभाली।

ऐसा मुस्लिम नेता जिसने संभाली थी हिंदू महासभा की कमान, आज भी पूरे पाकिस्तान में चलता है उनका दवाखाना
Ankit Ojhaलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीSun, 11 Feb 2024 09:03 PM
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हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर आजादी की लड़ाई लड़ी। अंग्रेज फूट डालने की कोशिश करते रहे लेकिन वे लाठी मारकर पानी को अलग ना कर सके। जब मुसलमान आजादी के दीवानों की बात आती है तो हकीम अजमल खान का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। भारत में भले ही उनको कम याद किया जाता हो लेकिन पूरे पाकिस्तान में आज भी उनके नाम पर दवाखाने चलते हैं। उन्हें मसीहा-ए-हिंद भी कहा जाता है। हकीम अजमल खान कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। बीबीसी में एक सरकारी वेबसाइट के हवाले से बताया गया कि वह हिंदू महासभा के भी अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। 

हकीम अजमल खान ना केवल आजादी के मतवाले थे बल्कि एक नामी हकीम और लेक्चरर भी थे। उन्होंने खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व किया तो वहीं असहयोग आंदोलन का भी हिस्सा रहे। बताया जाता है कि वह रोज सुबह करीब 200 मरीजों को देखते थे। चेहरा देखकर ही वह बीमारी की पहचान कर लेते थे। हकीम होने के पेशे की वजह से ही वह अंग्रेजों के खिलाफ भी हुए थे और फिर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 

दरअसल 1910 में अंग्रेजी सरकार ने भारतीय हकीमों और वैद्यों की प्रोफेशनल मान्यता वापस लेने का फैसला किया। इसके बाद हकीम अजमल खान ने हकीमों और वैद्यों को सरकार के खिलाफ एकजुट किया। 1918 में हकीम अजमल खान कांग्रेस में शामिल हुए। दिल्ली के बल्लीमारान में उनका घर हुआ करता था। अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें हाजिम उल मुल्क की उपाधि स नवाजा था। अजमल खान ने अंग्रेजों की उपाधि वापस कर दी। 1921 में इलाहाबाद के अधिवेशन के बाद अजमल खान को इंडियन नेशनल कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। वह ऐसे पांचवें मुसलमान थे जो कि कांग्रेस के अध्यक्ष बने। 

विदेशी कपड़ों से ऐसी नफरत कि इलाज से कर दिया इनकार
बताया जाता है कि असहयोग आंदोलन के समय ही महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का आह्वान किया था। उसी समय एक राजा ने हकीम साहब को रानी के इलाज के लिए बुलवाया। वह जब रानी के कमरे में पहुंचे तो देखा कि उन्होंने विदेशी कपड़े पहने थे और वहां  बहुत सारा विदेशी सामान रखा था। इसके बाद उन्होंने सलाह दी कि आपको खादी का इस्तेमाल करना चाहिए। रानी ने खादी की  बुराई की तो उन्होंने नब्ज छोड़ दी और कहा कि अगर आपको खादी चुभती है तो मेरी उंगली भी चुभती होगी। 

बता दें कि हकीम अजमल खान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लेक्चरर रहे। इसके अलावा वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापक सदस्यों में थे। 1920 से निधन तक सात साल वह जामिया के चांसलर रहे। 

बाबर के साथ भारत आए थे पूर्वज
बताया जाता है कि हकीम अजमल खान के पुरखे मुगल बादशाह बाबर के साथ ही भारत आए थे। उनके पूर्वज भी मुगलों का इलाज किया करते थे। वे सभी यूनानी दवादेते थे। पुरखों से ही उन्हें इलाज का हुनर मिला था। हकीम साहब महात्मा गांधी से लगभग 6 साल बड़े थे। करोल बाग में चलने वाला तिब्बतिया अस्पताल हकीम अजमल खान की ही देन है। महात्मा गांधी ने उन्हें यहां अस्पताल खोलने की सलाह दी थी। इसके बाद जमीन दिलवाने में भी उन्होंने मदद की। 

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