समाज की आत्मा के सजग चितेरे थे मुंशी प्रेमचन्द
मुंशी प्रेमचंद केवल एक महान लेखक ही नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा के प्रतिनिधि थे। उन्होंने गरीबों, किसानों और महिलाओं की पीड़ा को अपनी लेखनी द्वारा व्यक्त किया। उनकी जयंती पर साहित्यकारों ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया, और बताया कि उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं।
मुंशी प्रेमचंद केवल महान कथाकार नहीं बल्कि भारतीय समाज की आत्मा के सजग चितेरे थे। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से गरीबों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं और समाज के वंचित वर्गों की पीड़ा को स्वर दिया। यह बातें शुक्रवार को कथाकार मुंशी प्रेमचन्द की जयंती पर जीआईसी परिसर में स्थापित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. श्याम शंकर शुक्ल ने कही। मुंशी प्रेमचन्द की जयंती पर शुक्रवार को जिले के तमाम साहित्यकार जीआईसी परिसर में स्थापित उनकी प्रतिमा के समक्ष इकट्ठा हुए। प्रतिमा पर माल्यार्पण कर साहित्यकारों ने नमन किया। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. दयाराम मौर्य रत्न ने बताया कि मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गांव में हुआ था।
उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज, प्रतापगढ़ में शिक्षक के रूप में भी अपनी सेवाएं दी थीं। इसी दौरान उनके प्रथम लघु उपन्यास असरार-ए-मआबिद जिसका हिंदी नाम देवस्थान रहस्य है की रचना-यात्रा यहीं से प्रारंभ हुई थी। वक्ताओं ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उनके समय में थीं। बदलते सामाजिक परिवेश में भी उनकी कहानियां मनुष्य को करुणा, न्याय, समानता और मानवीयता का संदेश देती हैं। उनकी लेखनी समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करने के साथ ही एक बेहतर और संवेदनशील भविष्य की राह भी दिखाती है।इस दौरान लायंस क्लब हर्ष के अध्यक्ष डॉ. श्याम शंकर शुक्ल श्याम, सचिव संतोष भगवन, कोषाध्यक्ष दिनेश प्रताप सिंह, वरिष्ठ उपाध्यक्ष राजेश पाल, उपाध्यक्ष आरबी सिंह, प्रशासक क्षितिज श्रीवास्तव, पर्यावरण चेयरपर्सन सुभाष सोनी, प्रेम कुमार त्रिपाठी तथा डॉ. शाहिदा रोशनलाल उमरवैश्य, आनंद मोहन ओझा आदि मौजूद रहे।


