विनय कमजोरी नहीं, जीवन की सबसे बड़ी ताकत: मुनि श्री
धन, वैभव और पद की उपलब्धियों के बावजूद विनम्रता आवश्यक है। मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने धर्मसभा में कहा कि अभिमान व्यक्ति के विकास में बाधक बन सकता है। विनय का सही अर्थ समझना और दूसरों के गुणों को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है। सच्ची विनम्रता से समाज में सम्मान मिलता है।

पीरटांड़, प्रतिनिधि। धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा जीवन की उपलब्धियां हैं, लेकिन जब इन उपलब्धियों के साथ अभिमान जुड़ जाता है तो यही सफलता व्यक्ति के विकास में बाधक बन जाती है। उपलब्धियां बढ़ने के साथ विनम्रता भी बढ़नी चाहिए। अपनी सामर्थ्य और संसाधनों का उपयोग दूसरों को छोटा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को अधिक उपयोगी बनाने के लिए करना ही ‘विनय संपन्नता’ है। उक्त बातें राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने सोलह कारण भावना प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत ‘विनय संपन्नता’ विषय पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहीं। गुणायतन में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन देते हुए मुनि श्री ने कहा कि कुछ लोग विनय को हीनता अथवा कमजोरी समझते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि विनय व्यक्ति की सबसे बड़ी शक्ति है।
सच्चा विनयी सम्मान पाने की अपेक्षा नहीं रखता, फिर भी उसका सहज व्यवहार उसे समाज में सम्मान दिलाता है। इसके विपरीत अभिमान व्यक्ति को दूसरों से दूर कर देता है। उन्होंने कहा कि सम्मान से समर्पण और समर्पण से सरलता का जन्म होता है। दूसरों के गुणों को स्वीकार करना और उनका सम्मान करना विनय का महत्वपूर्ण स्वरूप है। व्यक्ति को समय-समय पर स्वयं से यह पूछना चाहिए कि उसका व्यवहार दूसरों के प्रति कैसा है और उसमें कठोरता अधिक है या मृदुता। मुनि श्री ने स्पष्ट कहा कि विनम्रता का अर्थ हर बात में सहमति देना नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर अपनी असहमति व्यक्त करना भी उचित है, लेकिन भाषा और व्यवहार में सम्मान बना रहना चाहिए। यदि कोई कार्य संभव नहीं है तो सहजता से “माफ कीजिए, मैं यह नहीं कर पाऊंगा” कहना पर्याप्त है। दृढ़ता के साथ शालीनता बनाए रखना ही सच्ची विनय है। उन्होंने कहा कि सत्य बोलना आवश्यक है, लेकिन सत्य के नाम पर किसी का अपमान करना उचित नहीं। जीवन में कई प्रसंग ऐसे होते हैं, जिन्हें अनदेखा कर देना ही बेहतर होता है। अनावश्यक बातों को मन में न रखना, परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करना और दोषारोपण से बचना मन की सरलता के लक्षण हैं।मुनि श्री ने कहा कि बाहर शिष्ट व्यवहार करना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन विनय की असली परीक्षा घर में होती है। परिवार के बीच अपनी गलतियों को स्वीकार करना, दूसरों से सीखना और उनके गुणों का सम्मान करना वास्तविक विनय है। बड़ा-छोटा होने का भाव कई बार मन की कल्पना मात्र होता है। प्रत्येक जीव में आत्मा का स्वरूप समान है। इसलिए दूसरों को हीन समझने के बजाय उनके गुणों को ग्रहण करने का भाव होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें ऐसी दृष्टि विकसित करनी चाहिए, जिसमें दूसरों के दोषों की बजाय उनके गुण दिखाई दें। यदि किसी की बात तुरंत चुभ जाए और व्यक्ति स्वयं को अपमानित महसूस करने लगे, तो यह उसके भीतर मौजूद मान की ओर संकेत करता है। इसके विपरीत अनावश्यक बातों को सहजता से छोड़ देना मन की सरलता का परिचायक है।


