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युद्ध के बीच यूक्रेन से निकाले गए थे 1000 भारतीय छात्र, अब इस देश में शुरू की पढ़ाई

2021 में युद्ध प्रभावित देश यूक्रेन से निकाले गए, सैकड़ों भारतीय एमबीबीएस छात्रों ने उस वक्त सोचा था कि अब उनकी पढ़ाई खत्म हो चुकी है। लेकिन इन्हें उज्बेकिस्तान में एडमिशन मिल गया है।

युद्ध के बीच यूक्रेन से निकाले गए थे 1000 भारतीय छात्र, अब इस देश में शुरू की पढ़ाई
Gaurav Kalaलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीThu, 16 Nov 2023 07:08 AM
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यूक्रेन में रूस का हमला दो साल पहले शुरू हुआ था। 2021 में शुरू हुआ यह कत्लेआम अभी भी जारी है। रूसी सैनिक पीछे हटने को तैयार नहीं है। यूक्रेन रूसी सैनिकों को उसी की भाषा में तगड़ा जवाब दे रहा है लेकिन, महायुद्ध ने उसके कई शहरों को बर्बाद कर दिया है। लाखों यूक्रेनी अपना मुल्क छोड़कर अन्य देशों में शरण लिए हुए हैं। युद्ध की इस विभिषिका का दंश हजारों भारतीय छात्रों ने भी झेला है। दो साल पहले यूक्रेन से निकाले गए भारतीय मेडिकल स्टूडेंट्स को अब जाकर अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करनी पड़ी है। उज्बेकिस्तान के एक जाने-माने विश्वविद्यालय में इन 1000 छात्रों ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दी है।

2021 में युद्ध प्रभावित देश यूक्रेन से निकाले गए, सैकड़ों भारतीय एमबीबीएस छात्रों ने उस वक्त सोचा था कि अब उनकी शैक्षणिक यात्रा लगभग खत्म हो चुकी है। लेकिन अब उन्होंने पढ़ाई फिर से शुरू कर दी है। इन छात्रों ने उज्बेकिस्तान के एक अग्रणी मेडिकल यूनिवर्सिटी में अपनी पढ़ाई शुरू कर दी है। यूक्रेन में भारतीय दूतावास के प्रयासों के बाद उज्बेकिस्तान में समरकंद स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी ने यूक्रेन में पढ़ रहे 1000 से अधिक भारतीय मेडिकल छात्रों को अपने यहां एडमिशन दे दिया है।

इन्हीं छात्रों में एक बिहार के बेगुसराय के अमित भी हैं। ये रूसी हमले की उस रात का जिक्र करते हुए सिहर जाते हैं कि यूक्रेन में वो रात उन्हें एक तहखाने में बितानी पड़ी थी क्योंकि रूसी मिसाइलें हर ओर से घरों, इमारतों और सबकुछ नष्ट कर रही थी। वह 'ऑपरेशन गंगा' के तहत भारत सरकार द्वारा निकाले गए छात्रों में से थे। 

अमित का कहना है,"मैंने सोचा था कि मैं यूक्रेन से बाहर नहीं निकल पाऊंगा। या तो मर जाऊंगा या यूक्रेन में ही फंसा रहूंगा। एक बार जब मैं भारत वापस आया, तो मुझे और मेरे परिवार को राहत मिली। लेकिन फिर पढ़ाई को लेकर अनिश्चितता थी। मैंने एमबीबीएस की पढ़ाई में यूक्रेनी विवि से तीन साल पूरे कर लिए थे और इसे दोबारा शुरू करना या कुछ और करना कोई विकल्प नहीं था। बाद में मैंने उज्बेकिस्तान जाने का फैसला किया।'' 

खर्चा ज्यादा लेकिन युद्ध के माहौल से दूर रहना सुकून
उनका कहना है कि समरकंद में रहने का खर्च यूक्रेन की तुलना में अधिक है लेकिन वह अपनी शिक्षा जारी रखने से खुश हैं। उधर, पंजाब के फिरोजपुर की तन्वी वाधवा, जो यूक्रेन में बुकोविनियन स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ रही थीं, एक सेमेस्टर के नुकसान के कारण विश्वविद्यालय में शामिल होने को लेकर आशंकित थीं। उज्बेकिस्तान में एसएसएमयू के कुलपति डॉ. जफर अमीनोव ने कहा कि जब युद्ध शुरू हुआ तो भारतीय दूतावास ने उनसे संपर्क किया था। 

उन्होंने कहा, "हमने ऐसे छात्रों की आवश्यकताओं का मूल्यांकन किया और निर्णय लिया कि उन्हें एक सेमेस्टर बैक के साथ एडमिशन दिया जा सकता है। हमने भारतीय छात्रों की सहूलियत के लिए 30 और भारतीय शिक्षकों को काम पर रखा है कि उच्चारण संबंधी कोई समस्या न हो।" अमीनोव ने कहा कि विश्वविद्यालय ने यूक्रेन से स्थानांतरित होकर आए 1,000 से अधिक भारतीय छात्रों को यहां एडमिशन दिया गया है।

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