ज्ञान को फास्ट फूड बना रही कृत्रिम मेधा
मोबाइल और कृत्रिम मेधा की बढ़ती भूमिका के कारण ज्ञान अब फास्ट फूड जैसा बन गया है। केंद्रीय हिंदी संस्थान में प्रो. शंभूनाथ ने कहा कि सच और झूठ के बीच का फर्क समझना मुश्किल हो रहा है। इस दौर में सभी को सवाल पूछना और सोचने की आदत डालनी चाहिए। ज्ञान की असली ताकत न्याय में है।

मोबाइल और कृत्रिम मेधा ने ज्ञान को फास्ट फूड जैसा बना दिया है। आज के परिवेश में जो स्क्रीन पर दिख रहा है, वही सच माना जा रहा है। इससे झूठी सूचनाओं का आतंक बढ़ गया है। केंद्रीय हिंदी संस्थान के अनुसंधान एवं भाषा विकास विभाग की ओर से आयोजित पाणिनि व्याख्यानमाला में यह विचार संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो.शंभूनाथ ने व्यक्त किए। 'भारतीय ज्ञान परंपरा: सभ्यतागत उपलब्धियां' विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा कि अब सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल होता जा रहा है। इस दौर में सबसे जरूरी है 'देखना' सीखना। यानी हर बात को आंख बंद करके नहीं मानना।
सोचना और सवाल पूछना। ज्ञान किताबों में बंद नहीं है। वह सवालों से बनता है। ज्ञान का असली मकसद न्याय है। प्रो. शंभूनाथ ने कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा उत्पादन की वस्तु नहीं है। मनुष्य की मेधा और संवेदना का जीवंत सृजन है। संस्थान के निदेशक प्रो. हरिशंकर ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आदिवासी ज्ञान परंपरा को भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा का अविभाज्य अंग है। संचालन अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग के सहायक आचार्य डॉ.पुरुषोत्तम पटेल ने किया। धन्यवाद डॉ.परमान सिंह ने दिया।


