अंग्रेजी गोलियों के बीच शहीद हुए थे चंद्रमा प्रसाद समेत कई क्रांतिकारी
महाराजगंज की धरती ने आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों के बलिदान की गवाह बनी। 16 अगस्त 1942 को, तिरंगा लेकर निकले वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ साहस का परिचय दिया। शहीद चंद्रमा प्रसाद समेत कई युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। यह घटना आज भी देशभक्ति और बलिदान की प्रेरणा देती है।

विनय पांडेय, महाराजगंज। आजादी की लड़ाई में महाराजगंज की धरती भी क्रांतिकारियों के अदम्य साहस और बलिदान की गवाह रही है। 16 अगस्त 1942 का वह दिन इतिहास के पन्नों में देशभक्ति, साहस और बलिदान की अमिट गाथा बनकर दर्ज है, जब अंग्रेजी हुकूमत की बंदूकों के सामने तिरंगा लेकर निकले आजादी के दीवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसी संघर्ष में महुआरी गांव निवासी अमर महतो के पुत्र शहीद चंद्रमा प्रसाद भी अंग्रेजी गोलियों के शिकार हुए थे। बताया जाता है कि वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। गांधीजी के ‘करो या मरो’ के आह्वान ने देशवासियों के भीतर आजादी की ऐसी ज्वाला जलाई, जिसे अंग्रेजी हुकूमत की बंदूकें भी नहीं बुझा सकीं। महाराजगंज में भी बड़ी संख्या में नौजवान आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।
क्रांतिकारियों का कारवां
16 अगस्त को करीब दो से ढाई सौ नौजवानों की टोली शहीद फुलेना प्रसाद के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकते हुए आगे बढ़ी। फुलेना प्रसाद हाथ में तिरंगा लिए चल रहे थे। उनके साथ उनकी पत्नी तारा रानी, देवशरण सिंह, उमाशंकर दत्त शर्मा, उमाशंकर प्रसाद, सरयुग प्रसाद, चंद्रिका राम, बंसीलाल, चंद्रमा प्रसाद समेत अनेक क्रांतिकारी शामिल थे। क्रांतिकारियों का कारवां सबसे पहले महाराजगंज रेलवे स्टेशन पहुंचा। इसके बाद आंदोलनकारी आगे बढ़े और रजिस्ट्री कचहरी पहुंचे। वहां अंग्रेजी हुकूमत के प्रतीक यूनियन जैक को हटाकर तिरंगा फहराने का संकल्प लिया गया। तनावपूर्ण माहौल के बीच क्रांतिकारियों ने रजिस्ट्री कार्यालय पर तिरंगा फहराया और फिर उनका काफिला महाराजगंज थाना की ओर बढ़ गया।
अंग्रेजी बंदूकों के सामने नहीं झुका तिरंगा
महाराजगंज थाना के पास पहुंचते ही अंग्रेजी पुलिस ने क्रांतिकारियों को रोकने के लिए मोर्चा संभाल लिया था। बताया जाता है कि थाना से करीब 100 गज उत्तर दिशा में पुलिस बल तैनात था। अंग्रेजी सैनिकों को देखकर क्रांतिकारियों का काफिला कुछ देर के लिए ठिठका, लेकिन आजादी का जुनून उनके कदम नहीं रोक सका। इसी दौरान तारा रानी ने अपने पति फुलेना प्रसाद का हौसला बढ़ाते हुए उन्हें आगे बढ़ने के लिए ललकारा। इसके बाद फुलेना प्रसाद हाथ में तिरंगा लिए थाना गेट की ओर बढ़ चले। अंग्रेज थानेदार रमजान अली ने उन्हें तिरंगा फहराने से रोकने का प्रयास किया, लेकिन फुलेना प्रसाद पीछे नहीं हटे। बताया जाता है कि थानेदार के आदेश पर क्रांतिकारियों पर गोलियां चला दी गईं। गोलियों की बौछार के बावजूद फुलेना प्रसाद के कदम नहीं रुके। उनके शरीर में कई गोलियां लगीं, लेकिन हाथ में थामा तिरंगा उन्होंने नहीं छोड़ा। अंततः वे थाना परिसर में तिरंगा फहराने में सफल हुए और देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।
शहीद चंद्रमा प्रसाद ने भी दी थी कुर्बानी
इस ऐतिहासिक संघर्ष में महुआरी गांव निवासी अमर महतो के पुत्र चंद्रमा प्रसाद भी अंग्रेजी पुलिस की गोलियों के शिकार हुए। मातृभूमि की आजादी के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका बलिदान महाराजगंज की मिट्टी में आज भी देशभक्ति और शौर्य की कहानी सुनाता है। आज जहां महाराजगंज थाना परिसर में शहीद फुलेना प्रसाद की स्मृति जीवित है, वहीं 16 अगस्त 1942 की वह घटना नई पीढ़ी को यह संदेश देती है कि आजादी हमें यूं ही नहीं मिली। इसके पीछे हजारों वीरों का त्याग, संघर्ष और बलिदान छिपा है। तिरंगा उस दिन केवल एक झंडा नहीं था, वह गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने का संकल्प था। अंग्रेजी गोलियां शरीर को छलनी कर सकती थीं, लेकिन क्रांतिकारियों के दिल में जल रही आजादी की लौ को बुझा नहीं सकीं। महाराजगंज की धरती के इन वीर सपूतों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा राष्ट्रप्रेम, साहस और मातृभूमि के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता रहेगा.


