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युवा गांधी को गढ़ने वाला शहर

young mahatma gandhi

भारत और इंग्लैंड के बीच प्यार और नफरत का रिश्ता रहा है। उसे महात्मा गांधी के जीवन सफर से बखूबी समझा जा सकता है। लंदन में कानून की पढ़ाई से उसकी शुरुआत होती है। फिलहाल दोनों ही देश उस दौर से आगे निकल चुके हैं। आज ब्रिटेन के उदारवाद को भारतीय नेता सराहते हैं। ब्रिटेन भी उस व्यक्ति का सम्मान करता है, जिसका कभी उन्हीं के प्रधानमंत्री सर विंस्टन चर्चिल ने ‘अधनंगा फकीर' कहकर मजाक उड़ाया था।

बतौर छात्र लंदन में बिताए दिनों का गांधी के जीवन पर गहरा असर पड़ा। इतिहासकारों ने गांधी के शाकाहारी भोजन जुटाने, वेजिटेरियन सोसायटी से जुड़ने व बाद में उसके सचिव बनने और कानून के नियमों को समझने और अपनाने के उनके संघर्ष का उल्लेख किया है। यही संघर्ष आगे चलकर अलगाववाद और भेदभाव के खिलाफ उनकी लड़ाई का आधार बनता है।

2015 में, पार्लियामेंट स्क्वेयर में गांधी की प्रतिमा का अनावरण करते हुए तबके प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा था, ‘उस प्रेरक व्यक्तित्व ने ब्रिटेन में रहकर ही खुद को जाना और अपने सच के लिए खड़े हुए। बतौर युवा लंदन में ही गांधी ने याचिका दायर करना, पत्रों का प्रारूप तैयार करना और भाषण देना सीखा. . . इस खास जगह गांधी की मूर्ति लगाकर हम उन्हें हमेशा के लिए अपने यहां बसा रहे हैं।' लंदन का यही असर था कि 1909 में गांधी ने कहा था, ‘भारत के बाद अगर दुनिया में कहीं रहना हो तो मैं लंदन में रहना चाहूंगा।'

सार्वजनिक सम्मान

रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी' (1982) ने दुनियाभर में उनकी पहुंच को बढ़ाया था। पर, ब्रिटेन में गांधी को पहला सार्वजनिक सम्मान 1948 में उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद ही दे दिया गया था। 1931 में दूसरे गोल मेज सम्मेलन के लिए लंदन के अपने अंतिम दौरे में गांधी सामुदायिक केंद्र टावर हैमलेट्स में ठहरे थे। 1954 में टावर हैमलेट पर उनकी प्रशंसा में नीली पट्टिका (ब्लू प्लाक) लगाई गई थी। पहली बार किसी भारतीय को यह सम्मान दिया गया था। उसके बाद 1986 में एक और नीली पट्टिका हैमरस्मिथ के घर पर भी लगाई गई, जहां 1880 में गांधी बतौर छात्र रहे थे।

‘अपने समय के इस महानतम व्यक्ति' को सम्मान देने के लिए लंदन सिटी काउंसिल ने ब्लू प्लाक के अपने नियम में छूट ली थी। इससे पहले तक ब्लू प्लाक सम्मान केवल उन्हीं प्रमुख हस्तियों को मिलता था, जिनकी मृत्यु को कम से कम 20 वर्ष हो गए हों। ब्रिटेन में गांधी की मूर्तियां अन्य जगह भी लगाई गई हैं। एक नई मूर्ति आगामी 25 नवंबर को मेन्चेस्टर के मेडीवियल क्वार्टर में लगाई जाएगी।

हाउस ऑफ लॉर्ड्स के माननीय सदस्य और प्रमुख शिक्षाविद हैं भीखू पारेख। हल्स म्यूजियम क्वार्टर में गांधी की मूर्ति लगवाने में उनकी खास भूमिका रही है। वह कहते हैं, ‘आज ब्रिटेन में गांधी तीन कारणों से प्रासंगिक हैं। पहला, गांधी ब्रिटेन को अपने ही बारे में सोचने वाले देश के बजाय उदारवादी और प्रगतिशील सोच रखने वाले देश के तौर पर देखना पसंद करते। दूसरा, आज ब्रिटेन में जो सार्वजनिक बहसें हो रही हैं, उनसे वह दुखी होते और समाज को जोड़ने वाली भाषा अपनाने पर जोर देते। तीसरा, वह ब्रिटेन को फिर से व्यवस्थित होकर एकजुट होने के लिए कहते। साथ ही जलवायु परिवर्तन पर भी वह जरूर कुछकहते।'

यह गांधी का वेजिटेरियन सोसायटी से जुड़ना था, जिसने ब्रिटिश समाज के दरवाजे उनके लिए खोल दिए थे। वहां रह रहे बहुत कम भारतीय छात्रों की इतनी पहुंच थी। हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य मेघनाद देसाई मानते हैं कि लंदन ने गांधी को एक जिम्मेदार युवा बनने में मदद की। वह कहते हैं, ‘वेजिटेरियन सोसायटी में सभी तरह के लोग थे, इससे गांधी का दायरा बढ़ा। यहां उन्होंने बिजनेस मीटिंग करना, नोट लिखना, याचिका बनाना, भाषण देना सीखा। सेहत से जुड़ी उनकी सोच भी यहीं पर विकसित हुई। शाकाहारियों ने गांधी का अपनी धार्मिक मान्यताओं पर विश्वास दृढ़ किया। मांस और शराब का सेवन नहीं करने के अपनी मां से किए गए वादे को वे इन्हीं ब्रिटिश मित्रों के कारण निभा पाए।'

गांधी और उनके विचारों का असर कुछ ब्रिटिश नेताओं पर भी पढ़ा। मजदूर नेता टोनी बेन (1925-2014) इनमें प्रमुख हैं। गांधी के 1931 के इंग्लैंड दौरे में बालक टोनी बेन ने उनसे हाथ मिलाया था। बेन के पिता भारत सचिव थे। 1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु पर बेन ने यहां तक कहा, ‘अकसर कहा जाता है कि ब्रिटेन ने भारत को आजाद किया। सच यह है कि गांधी और नेहरू ने हमें आजाद किया। अपनी आजादी जीतकर उन्होंने ब्रिटेन को शाही साम्राज्य के मिथकों के पीछे छिपी अज्ञानता और पूर्वाग्रहों से मुक्त कर दिया।'

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