मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल ने यूसीसी विधेयक के मसौदे को मंजूरी दी

हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल ने समान नागरिक संहिता 2026 विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी है। इसमें तीन तलाक, निकाह हलाला से संबंधित मामलों को अपराध माना गया है। विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य होगा, और सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा मिलेगा। कानून का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों को सशक्त बनाना है।

मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल ने यूसीसी विधेयक के मसौदे को मंजूरी दी

मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल ने रविवार को समान नागरिक संहिता 2026 विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी। इसमें तीन तलाक, निकाह हलाला से जुड़े मामलों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इसके अलावा बहुविवाह पर रोक, शादी और तलाक दोनों का पंजीयन अनिवार्य करने तथा विवाहित या अविवाहित माता-पिता के जैविक या गोद लिए जाने सहित सभी प्रकार के बच्चों को उत्तराधिकार में समान कानूनी दर्जा देने का प्रावधान है। इसे विधेयक को सोमवार से शुरू हो रहे राज्य विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा। मंत्रिमंडल की विशेष बैठक में इस विधेयक को मंजूरी मिलने के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि आदिवासी समुदाय को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। उन्होंने यूसीसी को संविधान में निहित समानता, बराबरी, न्याय और धर्मनिरपेक्षता की सोच को साकार करने की दिशा में उठाया गया बड़ा और ऐतिहासिक कदम करार दिया। उन्होंने कहा कि इस संहिता का मुख्य मकसद महिलाओं के साथ होने वाले पुराने भेदभाव को खत्म करना, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें सशक्त बनाना है.

मुख्यमंत्री के विचार

मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड, गुजरात और असम में लागू यूसीसी के गहन अध्ययन के बाद मध्यप्रदेश यूसीसी विधेयक को तैयार किया गया है। विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए गठित समिति के समक्ष करीब 80 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं ने, जबकि 40 प्रतिशत मुस्लिम पुरुषों ने इसका समर्थन किया। मुख्यमंत्री ने सभी राजनीतिक दलों से इस विधेयक का समर्थन देने का आह्वान किया।

महिलाओं को ज्यादा हक :

उन्होंने कहा कि यूसीसी सभी समुदायों में केवल एक ही शादी को अनिवार्य बनाता है। कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि विधेयक के तहत अमान्य सहमति और प्रतिबंधित रिश्तों (जब तक परंपरा की अनुमति न हो) के बीच विवाह पर रोक लगाई गई है। मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसले गैर-कानूनी माने जाएंगे। विधेयक में मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि पति ने किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है.

विवाह-तलाक का पंजीकरण अनिवार्य :

इस विधेयक के तहत शादी और तलाक दोनों का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके तहत तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए ‘निकाह हलाला’ जैसी अपमानजनक शर्तों को मानना, बढ़ावा देना या मजबूर करना दंडनीय अपराध माना जाएगा.

संपत्ति में समान अधिकार :

मुख्यमंत्री ने कहा कि विधेयक के कानून का स्वरूप लेने के बाद विवाहित या अविवाहित माता-पिता के बच्चों, जैविक, गोद लिए गए, सरोगेसी या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) से पैदा हुए सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा प्राप्त होगा। कस्टडी से जुड़े विवाद में माता-पिता के अधिकारों के मुकाबले 'बच्चे का हित और सर्वांगीण भलाई' ही अदालत के फैसले का अनिवार्य आधार होगी। विधेयक में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं, चाहे उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो.

गुजारा भत्ते का अधिकार :

इसके साथ ही विधेयक में लिव-इन में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास 'लिव-इन रिलेशनशिप का बयान' जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है। मुख्यमंत्री ने बताया कि विधेयक में 'लिव-इन' से पैदा हुए बच्चों को वैध दर्जा दिए जाने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) का दावा कर सकती है.

जेल-जुर्माने का प्रावधान :

विधेयक में प्रावधान किया गया है कि बिना पंजीकरण के एक महीने से ज्यादा साथ रहने पर तीन महीने तक की जेल या 10 हजार रुपये जुर्माना, गलत जानकारी देने पर तीन महीने की जेल और 25 हजार रुपये जुर्माना तथा रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर छह महीने तक की जेल और 25 हजार रुपये का जुर्माना देना होगा.

बता दें कि न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में यूसीसी का मसौदा तैयार करने के समिति गठित की गई थी, जिसने पिछले दिनों मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपी थी.

अब तक तीन राज्यों ने समान नागरिक संहिता लागू की

1. उत्तराखंड : स्वतंत्र भारत का पहला राज्य जिसने 27 जनवरी 2025 को यूसीसी को पूरी तरह लागू किया।

2. गुजरात : विधानसभा ने 25 मार्च 2026 को गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक, 2026 पारित किया।

3. असम : विधानसभा ने मई 2026 में असम समान नागरिक संहिता विधेयक, 2026 को मंजूरी दी। पूर्वोत्तर भारत में यह कानून लाने वाला असम पहला राज्य है।

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गोवा : यहां वर्ष 1867 से पुर्तगाली नागरिक संहिता लागू है। इसे 1961 में गोवा की मुक्ति के बाद भी राज्य में जारी रखा गया।

सामान नागरिक संहिता के बारे में सामान्य प्रश्न

मध्यप्रदेश यूसीसी विधेयक के अंतर्गत कौन सी नई बातें शामिल की गई हैं?
इसमें तीन तलाक, निकाह हलाला से जुड़े मामलों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है, बहुविवाह पर रोक, शादी और तलाक दोनों का पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रावधान है।

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