Madhya Pradesh Assembly Election Results 2018 because of these 4 weakness bjp defeat in mp - Madhya Pradesh Assembly Election Result: भाजपा की ये 4 कमजोरी नतीजों पर पड़ गई भारी DA Image
7 दिसंबर, 2019|9:35|IST

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Madhya Pradesh Assembly Election Result: भाजपा की ये 4 कमजोरी नतीजों पर पड़ गई भारी

  Madhya Pradesh Assembly Election Result: भाजपा की ये 4 कमजोरी नतीजों पर पड़ गई भारी

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव (Madhya Pradesh Assembly Election Result) में मतगणना पूरी हो चुकी है। सुबह तक चली मतगणना में कांग्रेस ने 114 सीटों पर कब्जा जमाया। वहीं बीजेपी ने 109 सीटों पर जीत दर्ज की। जिसके बाद बीएसपी ने भी कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया है। कांग्रेस मध्यप्रदेश में 15 साल बाद भाजपा को सीधे तौर सत्ता पर काबिज होने से रोकने पर कामयाब रही है। ढाई दशक में मध्य प्रदेश में ऐसा पहली बार हुआ जब कांग्रेस भाजपा पर भारी पड़ी। जानिए राज्य में किन कारणों से भाजपा हारी और कौन सी कमजोरी पड़ गई भारी...

एंटी इन्कंबेंसी-

मध्य प्रदेश में 15 साल से भाजपा का शासन रहा। इस बार एंटी इंन्कंबेंसी फैक्टर की हवा रही। भाजपा इस पर नियंत्रण नहीं कर सकी। कांग्रेस हर रैली में इस बात को प्रमुख से उठाते रहे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खुद अपनी रैली में शिव राज सिंह चौहान के कामकाजों पर सवाल उठा रहे थे।

नहीं संभले बागी-

भाजपा में इस बार उनके अपने नेताओं ने भी खुद बगावत की। इसे रोकने की स्थानीय स्तर पर और केंद्रीय स्तर पर बहुत कोशिश हुई लेकिन बागी मानने को तैयार नहीं हुए। भाजपा ने पहली सूची दो नवंबर को जारी की थी, जिसमें तीन मंत्रियों सहित 34 विधायकों के टिकट काट दिए गए थे। इसके बाद बगावत तेज हो गई। भाजपा की सभी 230 सीट पर जब टिकट फाइनल हुए तो 5 मंत्रियों सहित मौजूदा 52 विधायकों  का नाम लिस्ट में नहीं था। इस बार भाजपा के 63 बागी मैदान में उतरे थे। 

भ्रष्टाचार का मुद्दा -

व्यापम के मुद्दे को कांग्रेस ने ना केवल चुनावी समय बल्कि इसके पहले से मुद्दा बनाया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर कमलनाथ और ज्योतिराजसिंधिया तक ने अपनी रैलियों में शिवराज सिंह की सरकार को जमकर घेरा। विपक्षी हर जगह भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाते दिखक। 

कार्यकतताओं की नाराजगी-

बताया जा रहा है कि मध्य प्रदेश में इस बार कार्यकर्ता की बड़े नेताओं से नाराजगी रही। इस बार भाजपा ने 18  दलबदलुओं को टिकट दिया। इसका भी खूब विरोध कई जगह हुआ। लेकिन केंद्रीय और स्थानीय नेतृत्व ने किसी की नहीं सुनी। कई विधानसभा सीटों पर मौजूदा विधायकों से लोगों के साथ साथ कार्यकत्र्ता भी नाराज थे, इसके बाद भी उन्हें चुनावी मैदान में उतार दिया गया।

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