सुलतानपुर रोड पर 765 केवी सबस्टेशन की तैयारी
एससीआर में प्रस्ताव हुआ शामिल 5500 मेगावाट तक पहुंचेगी लखनऊ की बिजली मांग नए केवी

एससीआर में प्रस्ताव हुआ शामिल 5500 मेगावाट तक पहुंचेगी लखनऊ की बिजली मांग
नए केवी स्टेशन से मजबूत होगा ट्रांसमिशन नेटवर्क
लखनऊ। प्रमुख संवाददाता
उत्तर प्रदेश राज्य राजधानी क्षेत्र (यूपीएससीआर) में तेजी से बढ़ रही बिजली की मांग को देखते हुए सुलतानपुर रोड पर 765 केवी सबस्टेशन स्थापित करने की योजना का प्रस्ताव तैयार हुआ है। प्रस्तावित परियोजना का उद्देश्य भविष्य की बिजली जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क को अधिक मजबूत और भरोसेमंद बनाना है। एलडीए ने यूपीएससीआर के प्रस्ताव में इसे शामिल कर लिया है।
बिजली की मांग में वृद्धि
प्रस्ताव के अनुसार वर्तमान में लखनऊ जिले में करीब 2000 मेगावाट बिजली की मांग है, जबकि उपलब्धता 3350 मेगावाट है। हालांकि आने वाले वर्षों में शहरी विस्तार, औद्योगिक विकास और नई आवासीय परियोजनाओं के कारण बिजली की खपत तेजी से बढ़ने का अनुमान है। आकलन के मुताबिक वर्ष 2051 तक लखनऊ जिले की बिजली मांग बढ़कर 5500 मेगावाट तक पहुंच सकती है, जो पूरे यूपीएससीआर क्षेत्र की कुल मांग का लगभग 32 प्रतिशत होगी।
ट्रांसमिशन बाधाएं कम होंगी
परियोजना के तहत 765 केवी सबस्टेशन प्रदेश की विद्युत ग्रिड व्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान करेगा। इससे ट्रांसमिशन लाइन पर दबाव कम होगा और बिजली आपूर्ति में आने वाली बाधाओं को घटाने में मदद मिलेगी। साथ ही विभिन्न 400 और 220 केवी सबस्टेशनों के माध्यम से चरणबद्ध वितरण व्यवस्था विकसित की जाएगी। वर्तमान में जिले में चार सौ केवी के चार सबस्टेशन संचालित हैं, जबकि वर्ष 2029 तक तीन नए चार सौ केवी सबस्टेशन प्रस्तावित हैं। इसके अलावा नौ, 220 केवी के सब स्टेशन पहले से कार्यरत हैं।
दो विकल्पों का तैयार हुआ प्रस्ताव
यूपी पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीपीटीसीएल) के समक्ष परियोजना के दो विकल्प रखे गए हैं। पहला विकल्प 765 केवी एयर इंसुलेटेड सबस्टेशन (एआईएस) का है, जिसके लिए 150 से 200 एकड़ भूमि की आवश्यकता होगी। इसकी अनुमानित लागत 1200 से 1500 करोड़ रुपये बताई गई है। दूसरा विकल्प 765 केवी गैस इंसुलेटेड सबस्टेशन (जीआईएस) का है, जिसमें 80 से 110 एकड़ भूमि की जरूरत होगी, लेकिन लागत बढ़कर 2000 से 2200 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
तीन वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य
दोनों विकल्पों में भूमि अधिग्रहण आवश्यक होगा और परियोजना को तीन वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका क्रियान्वयन यूपीपीटीसीएल द्वारा किया जाएगा जबकि वित्तपोषण राज्य सरकार की सहायता और ईपीसी मॉडल के माध्यम से प्रस्तावित है।


