Lok Sabha Elections 2019 Social Media Misuse Control Not Possible Insufficient Law - 'सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल पर कंट्रोल मौजूदा चुनाव में संभव नहीं, कानून नाकाफी' DA Image

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'सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल पर कंट्रोल मौजूदा चुनाव में संभव नहीं, कानून नाकाफी'

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लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये चुनाव आयोग मुस्तैद है। लेकिन जानकारों की राय में मौजूदा नियम कानूनों में प्रभावी प्रावधान नहीं होने के कारण आयोग की पहल कारगर हो पायेगी, इस पर संदेह है। पेश है साइबर विशेषज्ञ पवन दुग्गल से सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के उपायों पर भाषा के पांच सवाल।

प्रश्न : सोशल मीडिया का दुरुपयोग किस हद तक चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है?
उत्तर : भारत में सोशल मीडिया के पिछले कुछ सालों में तेजी से हुये प्रसार को देखते हुये चुनाव में इसके प्रभावी असर की संभावना से इंकार करना कठिन है। भारत में सोशल मीडिया के कंटेंट की सच्चाई को प्रमाणित नहीं करने की प्रवृत्ति, चुनाव में इसके दुरुपयोग के खतरे को बढ़ा देती हैं। लोगों की धारणायें बदलने में सक्षम सोशल मीडिया से मतदाताओं की सोच प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। 

प्रश्न : चुनाव में सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकने के लिये मौजूदा कानून और चुनाव आयोग के नये दिशा निर्देश कितने प्रभावी हैं?
उत्तर : सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में अभी हमने शुरुआत मात्र की है। चुनाव में सोशल मीडिया के दुरुपयोग से निपटने के लिये फिलहाल हमारे पास दो कानून हैं। पहला सूचना प्रोद्योगिकी (आईटी) कानून और दूसरा जनप्रतिनिधित्व कानून (आरपी) । दोनों ही कानून चुनाव के दौरान आने वाली चुनौती से निपटने में सक्षम नहीं हैं। इसीलिये चुनाव आयोग को इसके लिये नये दिशानिर्देश बनाने पड़े। ये सभी फर्जी खबरों के प्रसार के खतरे की बढ़ती चुनौती से निपटने में पूरी तरह से नाकाफी हैं। 

प्रश्न : विदेशों से संचालित सोशल मीडिया अकांउट की चुनाव में सोशल मीडिया के दुरुपयोग में अहम भूमिका सामने आयी है। निगरानी एजेंसियां इन पर कैसे नियंत्रण कर सकती है? 
उत्तर : विदेशों से संचालित सोशल मीडिया अकांउट पर नियंत्रण और प्रचार थमने के बाद 'साइलेंस पीरियड में सोशल मीडिया से प्रचार को रोकने के लिये आईटी कानून और आरपी कानून के अलावा चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों में कोई प्रावधान नहीं है। यही खामियां फर्जी खबरों के प्रसार और सोशल मीडिया के दुरुपयोग का सबसे बड़ा कारण हैं। 

प्रश्न : सोशल मीडिया के दुरुपयोग में राजनीतिक दलों की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिये क्या किया जाना चाहिये? 
उत्तर : चुनाव प्रक्रिया के प्रमुख भागीदार के रूप में राजनीतिक दलों के हित सर्वाधिक दांव पर होते हैं। इस कारण राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिये हर तरीका अपनाते हैं। सोशल मीडिया का दुरुपयोग भी इनमें से एक है। किसी उम्मीदवार को खुद साइलेंस पीरियड में सोशल मीडिया के मार्फत चुनाव प्रचार करने और फर्जी खबरों का प्रसार करने की कोई जरूरत नहीं है। यह काम उम्मीदवार की ओर से कोई भी कर सकता है। फर्जी खबरों को रोकने का एक ही उपाय है प्रभावी कानून को बना कर इसे प्रभावी रूप से लागू करना। मलेशिया में भी इसके लिये पुख्ता कानून है। भारत में ऐसा कानून नहीं होना दुखद है।  

प्रश्न : चुनाव में सोशल मीडिया के मार्फत फैलायी जाने वाली फर्जी खबरों की पहचान के लिये क्या पुख्ता व्यवस्था की जानी चाहिये ? 
उत्तर : फिलहाल हकीकत तो ये है कि 17वीं लोकसभा के चुनाव तो सोशल मीडिया के दुरुपयोग और फर्जी खबरों के खतरे के साये में ही लड़े जायेंगे। अब पूरा ध्यान अगले चुनाव में इन खतरों से निपटने में लगाना होगा। इस स्थिति से निपटने के लिये भविष्य में आर पी कानून और आईटी कानून में सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के सख्त प्रावधान करने के अलावा इसे भारतीय दंड संहिता में शामिल कर अपराध घोषित करना होगा। साथ ही सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वालों को सख्त सजा और उम्मीदवारों को कम से कम दस साल तक चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने जैसे प्रावधान करना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत को भी वही खामियाजा भुगतना होगा जो अमेरिका, राष्ट्रपति चुनाव में सोशल मीडिया के दुरुपयोग से भुगत रहा है। कानून बनाने का काम चुनाव आयोग का नहीं, सरकारों का है। लेकिन यह भी सच है कि भारत में कोई सरकार यह क्यों करना चाहेगी। क्योंकि राजनेता खुद इस दुरुपयोग के भागीदार होते हैं।

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