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उनकी याद ! एकाकी जीवन जी रहा धनबाद के प्रथम सांसद पीसी बोस का परिवार

pc bose

झरिया के अमलापाड़ा में गुलाम भारत के एमएलए और स्वतंत्र भारत में 1952 से लेकर 1959 तक सांसद रहे पीसी बोस का परिवार एकाकी जीवन जी रहा है। आज की राजनीति और तामझाम पर पीसी बोस के बड़े पुत्र शंकर बोस (88) कहते हैं कि मुझे अपने पिता पर गर्व है। उन्होंने पैसे के लिए बल्कि जनता के लिए राजनीति की। आज की तरह धनबल, शक्तिबल, बाहुबल का इस्तेमाल पहले नहीं होता था।

पिता के चुनाव में बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाले शंकर बोस कहते हैं कि उनकी सादगी के कारण ही देश के प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र बाबू, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू सहित कई नेता बहुत मानते थे। राजेन्द्र बाबू के घर हमेशा आना-जाना होता था। मां मृणाली बोस भी राजेन्द्र बाबू के घर जाती थीं। वह समय कुछ और था और आज का समय कुछ और है। तब धनबाद मानभूम में था। उनके पिता बहुत कम खर्च में चुनाव लड़ते थे। चुनाव के समय पुरुलिया के नौ थाना क्षेत्रों की कमान शंकर बोस खुद संभालते थे।

मजदूर संगठन प्रतिनिधि से एमएलए और सांसद का सफर तय किया: शंकर बोस कहते हैं कि पिताजी जनता की सेवा में रहते थे और मां हम भाई-बहनों की देखभाल करती थीं। पिताजी दो बार सांसद रहे। वे इंडियन माइनर्स एसोसिएशन, इंडियन माइन वर्कर्स फेडरेशन के अध्यक्ष, इंटक के उपाध्यक्ष, कोलमाइंस वेलफेयर एंड एडवाइजरी बोर्ड, कोल परिवहन एडवाइजरी बोर्ड, माइंस रेस्क्यू स्टेशन, झरिया माइंस बोर्ड ऑफ हेल्थ से भी जुड़े रहे, लेकिन कभी भी उनके पास अपना कोई वाहन नहीं था। 

उन्हें चाय और सिगरेट पीने का शौक था। 1920 में मजदूर संगठन, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने। 1920 में मुंबई में हुए अधिवेशन में पीसी बोस भी बिहार से गए थे। 1922 और 28 में झरिया में अधिवेशन हुआ था। 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरु अध्यक्ष बने थे।

1952 में विभूति भूषण दास थे प्रतिद्वंद्वी: चुनाव के संबंध में बताया कि 1947 से पहले ब्रिटिश सरकार ने चुनाव कराया था। इकलौता एमएलए थे। उस समय धनबाद, रांची, हजारीबाग सहित कोल बेल्ट के लिए केवल एक सीट थी। यूं कहे कि पूरे बिहार से इकलौते एमएलए थे। 1952 में लोक सेवक संघ के विभूति भूषण दास गुप्ता उनके प्रतिद्वंद्वी थे, जिन्हें भारी मतों से जनता ने पराजित किया था। विभूति भूषण दास पिताजी के दोस्त थे।

मां ने गांधी जी को दान दे दिए थे सारे गहने: शंकर बोस कहते हैं कि 1939 में गांधी जी अग्रवाल धर्मशाला में ठहरे थे। एक सप्ताह रहे। उस समय देश की आजादी के आंदोलन के लिए महिलाओं से गहने मांगे थे। मां मृणालिनी बोस ने अपने सारे गहने गांधी जी को दान में दे दिए थे। केवल हाथ में एक शाखाचूड़ी और नथिया अपने पास रखी थी।

पीसी अपनी तीन संतानों की नहीं करा पाए थे शादी
परिवार देश के लिए समर्पित रहा है। दो भाई हैं शंकर बोस (88) और तुषार बोस (70)। बहनों में गीता, मीरा और हीरा हैं। पिता ने शंकर बोस और गीता की शादी की। उनके निधन के बाद सभी बच्चे कुंवारे रह गए। गीता और मीरा इस दुनिया में नहीं है। हीरा साथ में रहती हैं। पिताजी के समय का सेवादार मंगल भी साथ हैं। शंकर बोस का पुत्र कम्प्यूटर इंजीनियर है। एक पोता है, जो दिल्ली में रहता है।

परिवार देश के लिए समर्पित रहा है। दो भाई हैं शंकर बोस (88) और तुषार बोस (70)। बहनों में गीता, मीरा और हीरा हैं। पिता ने शंकर बोस और गीता की शादी की। उनके निधन के बाद सभी बच्चे कुंवारे रह गए। गीता और मीरा इस दुनिया में नहीं है। हीरा साथ में रहती हैं। पिताजी के समय का सेवादार मंगल भी साथ हैं। शंकर बोस का पुत्र कम्प्यूटर इंजीनियर है। एक पोता है, जो दिल्ली में रहता है।

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  • Web Title:lok sabha elections 2019: political tale of PC bose the first member of parliament from dhanbad know about his family