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लोकसभा चुनाव 2019: मतदाताओं का मौन दलों के लिए अबूझ पहेली, 2014 जैसी लहर नहीं

                                   2019

लोकसभा चुनाव में बड़ी संख्या में मतदाताओं का मौन राजनीतिक दलों के लिए अबूझ पहेली बना हुआ है। हर राज्य में नजर आ रहे अलग-अलग समीकरण के चलते दूसरा चरण पूरा होने के बाद भी सियासी बयार का रुख समझना राजनीतिक धुरंधरों के लिए मुश्किल है। जानकारों का कहना है कि विभिन्न राज्यों में मतदान प्रतिशत का रुझान किसी उलटबांसी से कम नहीं है। पेश है पंकज कुमार पांडेय की रिपोर्ट...

2014 जैसी लहर नहीं 

जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनाव के दो चरणों की समीक्षा से साफ है कि चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों के साथ जातियों का व्यूह, गठबंधनों का समीकरण, क्षेत्रीय दलों का प्रभाव और उम्मीदवारों की शख्सियत भी चुनावों में अहम है। चुनाव की नब्ज टटोलने वाले कम्युनिकेशन एक्सपर्ट अनूप शर्मा का कहना है कि इस बार का चुनाव बहुत ही अलग है। इस बार 2014 की तरह कोई लहर नहीं नजर आ रही है। इसलिए क्षेत्रीय क्षत्रपों के किंग मेकर होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।  

मोदी आएंगे या जाएंगे के बीच मुकाबला

उत्तरप्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में सत्ता पक्ष की ध्रुवीकरण और हिन्दुत्व को धार देने की कोशिश को विपक्ष के जातीय समीकरण से बड़ी चुनौती मिल रही है। राष्ट्रवाद का मुद्दा एक खास वर्ग को ही अपील कर रहा है। भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा नहीं बना है। रोजगार मुद्दे पर विपक्ष की घेरेबंदी के बावजूद यह मुख्य मुद्दा बनने से रह गया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार मोदी तो आएंगे ही या मोदी तो जाएंगे ही के बीच मुकाबला जबरदस्त है।

पक्का दावा नहीं 

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवर्लंपग सोसाइटीज- सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार का कहना है कि मतदाता मुखर होता है, बहुत उत्साहित होता है तो हम अनुमान करते हैं कि यह वोट का टर्नआउट बढ़ाएगा। पर पहले चरण में टर्नआउट बढ़ा नहीं, कुछ राज्यों में करीब बराबर रहा, कुछ राज्यों में 2014 की तुलना में घट गया। दूसरे चरण में मतदान का रुख सभी राज्यों में एक जैसा नहीं है। इसलिए किसी भी पक्ष में पक्का दावा नहीं किया जा सकता।

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  • Web Title:Lok Sabha Elections 2019 nothing like 2014 Silence of Voters Remains unsolved puzzle for parties