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5 अगस्त, 2020|5:47|IST

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विडंबना: हजारों किलोमीटर जिंदगी की जंग, घर पहुंचे तो खाली हाथ

मजदूरों के लिए इससे बुरा दिन क्या होगा कि जो दिवस उनके हक के लिए मनाया जाता हो, उस दिन देश के लाखों मजदूर काम-धंधे बंद होने से अलग-अलग महानगरों से गांव जाने के लिए बेसब्र बैठे हैं। सरकार और संस्थान भी बताने की स्थिति में नहीं कि कब सब सामान्य होगा, कब वे काम पर लौटेंगे।

धैर्य का बांध टूटा : पहला लाकडाउन खत्म होने और *दूसरा लागू होने के बीच हजारों कामगारों के धैर्य का बांध टूट चुका है। वे पैदल और साइकिल से अपने-अपने गांव के लिए निकल गए। कठिन रास्ते और मुश्किलों से गुजरते हुए हजार किलोमीटर तक की यात्रा करके जब घर पहुंचे तो *कोरोना से बचाव के लिए क्वारंटाइन कर दिए गए। एकांतवास के तय 14 दिन की अवधि काट के जो घर पहुंचे, उनके सामने रोजी-रोटी का संकट है।

आर्थिक मदद शुरू : राज्य सरकारों में बिहार ने बाहर फंसे मजदूरों और जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए 1000 रुपये की सहायता राशि पहुंचाने का काम शुरू किया। राज्य से बाहर फंसे 1 लाख 3 हजार 579 लोगों के खाते में सहायता राशि भेजी गई। उत्तर प्रदेश सरकार भी राज्य से बाहर फंसे करीब दस लाख मजदूरों की घर वापसी सुनिश्चित करने के साथ उन्हें एक हजार रुपये की सहायता राशि दे रही है। साथ ही क्वारंटीन होने के बाद घर जाते वक्त उन्हें 15 दिन का राशन भी दिया जा रहा है।

वापसी की कोशिश : उत्तर प्रदेश ने मजदूरों की घर वापसी के लिए बसें भी मुहैया कराई। इलाज भी कराया। कुछ राज्य सरकारें भी प्रवासी मजदूरों को खाते में सहायता राशि पहुंचाकर फौरी मदद पहुंचा रही है। मजदूरों को उनके इलाके में ही काम मिले, ऐसी कोशिशें भी *अलग-अलग राज्यों में हो रही हैं। अमल में यह कब आएगा, कहा नहीं जा सकता।

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  • Web Title:Labour Day or May Day 2020: Story of labourers who stuck during coronavirus