एचआईवी के खौफ पर भारी ममता, 19 माताओं की गोद में किलकारियां
कुशीनगर, मिथिलेश द्विवेदी। मां बनने का सपना हर महिला देखती है, लेकिन

कुशीनगर, मिथिलेश द्विवेदी। मां बनने का सपना हर महिला देखती है, लेकिन एचआईवी संक्रमित महिलाओं के लिए यह सपना अक्सर एक ऐसे डर के साथ आता है, जो हर पल मन को झकझोरता है कि कहीं उनका संक्रमण उनके गर्भ में पल रहे शिशु तक न पहुंच जाए। कुशीनगर मेडिकल कॉलेज ने इसी डर को उम्मीद और मुस्कान में बदलने का काम किया है। यहां बीते एक वर्ष में 19 एचआईवी पॉजिटिव गर्भवतियों का सुरक्षित प्रसव कराया गया। इनमें जन्मे 10 नवजात पूरी तरह संक्रमण मुक्त पाए गए हैं, जबकि नौ अन्य बच्चों की नियमित निगरानी की जा रही है। विशेषज्ञों को भरोसा है कि वे भी स्वस्थ और एचआईवी निगेटिव रहेंगे। यह सफलता एआरटी, पीपीटीसीटी, आईसीटीसी, स्त्री एवं प्रसूति रोग और शिशु रोग विभाग की संयुक्त कोशिशों का परिणाम है।
सफलता की कहानी
मेडिकल कॉलेज के एआरटी (एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी), पीपीटीसीटी (प्रिवेंशन ऑफ पैरेंट-टू-चाइल्ड ट्रांसमिशन) आईसीटीसी (इंटीग्रेटेड काउंसलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर) और स्त्री एवं प्रसूति रोग, शिशु रोग समेत विभिन्न विभागों के विशेषज्ञ डॉक्टरों की संयुक्त टीम की बदौलत यह सफलता हाथ लगी है। इन टीमों द्वारा गर्भावस्था के दौरान महिला की समय-समय पर जांच, परामर्श, दवाओं की उपलब्धता और प्रसव तक सतत निगरानी सुनिश्चित की जाती है ताकि मां से बच्चे में संक्रमण की संभावना को न्यूनतम किया जा सके। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले एक वर्ष में 19 एचआईवी संक्रमित महिलाओं का यहां पर सुरक्षित प्रसव कराया गया। इनमें से 10 बच्चों की निर्धारित अवधि के बाद हुई जांच में संक्रमण नहीं मिला। शेष नौ बच्चों की आयु के अनुसार तय प्रोटोकॉल के तहत नियमित फॉलोअप और जांच की जा रही है। 18 महीने तक इनकी मॉनिटरिंग होगी। उम्मीद है कि इनकी भी एचआईवी रिपोर्ट निगेटिव आएगी। डॉक्टरों का कहना है कि उपचार और निगरानी लगातार जारी रहने से इनके भी संक्रमण मुक्त रहने की संभावना काफी अधिक है।
समाज में भ्रांतियों का समाधान
विशेषज्ञ बताते हैं कि एचआईवी संक्रमित गर्भवती महिला यदि समय पर जांच कराए, नियमित रूप से एआरटी दवा ले, चिकित्सकीय परामर्श का पालन करे और संस्थागत प्रसव कराए तो मां से बच्चे में संक्रमण का खतरा 30 से 40 प्रतिशत से घटकर दो प्रतिशत या उससे भी कम रह सकता है। यही कारण है कि अब एचआईवी संक्रमण मातृत्व की राह में पहले जैसी बाधा नहीं आ रही है। डॉक्टरों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती बीमारी नहीं, इसके प्रति समाज में फैली भ्रांतियां और डर हैं। कई महिलाएं सामाजिक संकोच के कारण समय पर जांच नहीं करातीं। जबकि शुरुआती पहचान और नियमित उपचार ही मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा की सबसे बड़ी कुंजी है। कुशीनगर मेडिकल कॉलेज की यह उपलब्धि चिकित्सा व्यवस्था की ही सफलता नहीं, उन परिवारों के लिए भी उम्मीद का संदेश है, जो एचआईवी संक्रमण के बावजूद स्वस्थ और सुरक्षित मातृत्व का सपना देखते हैं। सही समय पर जांच, बेहतर उपचार और समर्पित चिकित्सा टीम के प्रयास से एचआईवी पर भी मात पाई जा सकती है।
डॉक्टरों की सलाह
-------कोट
एचआईवी संक्रमण अब मातृत्व में बाधा नहीं है, बशर्ते गर्भवती महिला समय पर जांच कराए, नियमित उपचार ले और चिकित्सकीय सलाह का पालन करे। मेडिकल कॉलेज में एआरटी, पीपीटीसीटी, आईसीटीसी, स्त्री एवं प्रसूति रोग और शिशु रोग विभाग की टीम समन्वित रूप से कार्य कर रही है। इसी का परिणाम है कि एचआईवी संक्रमित माताओं से जन्मे अधिकांश बच्चे संक्रमण मुक्त हैं। हमारा प्रयास है कि हर गर्भवती तक समय पर जांच, परामर्श और उपचार पहुंचे ताकि मां और नवजात दोनों सुरक्षित एवं स्वस्थ रहें।
-डॉ. केपी गोंड, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज-कुशीनगर


