देसी नुस्खे हड्डी का दर्द दबाकर बीमारी बढ़ा रहे
केजीएमयू आर्थोपेडिक्स विभाग की कार्यशाला में खुलासा हुआ कि घुटने एवं कमर के दर्द के लिए मरीज देशी नुस्खों का उपयोग करते हैं। ग्रामीण इलाकों से आए मरीज कई प्रकार के घरेलू उपचार आजमाते हैं, जिससे वे बिना डॉक्टर के पास पहुंचे सालों तक दर्द झेलते हैं।

-आर्थोपेडिक्स विभाग व उत्तर प्रदेश ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन की कार्यशाला में हुआ खुलासा, बरसों दर्द सहने के बाद पहुंच रहे अस्पताल -केजीएमयू में छह में चार मरीज अपनाते हैं देसी नुस्खा
लखनऊ, वरिष्ठ संवाददाता।
घुटने में दर्द हुआ तो ट्रांसफार्मर के जले तेल की मालिश। कमर में दर्द हुआ तो कोई घरेलू लेप। हड्डी में चोट लगी तो गांव-मोहल्ले में बताए नुस्खे। डॉक्टर के पास जाने की बारी सबसे आखिर में। केजीएमयू हड्डी रोग विभाग की ओपीडी में आने वाले करीब छह में चार मरीजों की कहानी कुछ ऐसी ही है। खासकर ग्रामीण इलाकों से आने वाले मरीज पहले एक या अधिक देसी नुस्खे आजमाते हैं। कई मरीज महीनों ही नहीं, बल्कि वर्षों तक दर्द को घरेलू इलाज कराते हैं। बिना डॉक्टर की सलाह दर्द निवारक दवाओं से दबाते रहते हैं। नतीजा यह कि बीमारी बढ़ने के बाद अस्पताल पहुंचते हैं। यह जानकारी केजीएमयू हड्डी रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. आशीष कुमार ने दी。
कार्यशाला की जानकारी
रविवार को शहर के होटल में केजीएमयू आर्थोपेडिक्स विभाग और उत्तर प्रदेश ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन की कार्यशाला हुई। हड्डी रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. आशीष कुमार ने बताया कि ऑस्टियोआर्थराइटिस, ऑस्टियोपोरोसिस और फ्रैक्चर के मरीज कई तरह के नुस्के आजमाकर पहुंचते हैं। इनमें ट्रांसफार्मर का तेल लगाने से लेकर जनवरों की चर्बी, उड़द की दाल, चूना और शहद के मिश्रण का इस्तेमाल तक शामिल है।
दर्द का कारण और इलाज
कार्यशाला के सचिव डॉ. मयंक महेंद्र ने कहा कि लगातार दर्द को केवल दवा से दबाना ठीक नहीं है। दर्द हड्डी, जोड़, कार्टिलेज, लिगामेंट या अन्य मुलायम ऊतकों की बीमारी का संकेत हो सकता है। बीमारी का कारण पता लगाकर इलाज करना जरूरी है। डॉ. शैलेंद्र सिंह ने कहा कि लंबे समय तक बिना चिकित्सकीय निगरानी दर्द निवारक दवाएं लेने से बचने की सलाह दी।
ऑस्टियोपोरोसिस का प्रभाव
डॉ. देवरशी रस्तोगी ने कहा कि ऑस्टियोपोरोसिस लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षण रह सकता है। कई मरीजों को मामूली गिरने या चोट के बाद फ्रैक्चर होने पर बीमारी का पता चलता है।
रोबोटिक घुटना प्रत्यारोपण
डॉ. मयंक महेंद्र ने कहा कि रोबोटिक घुटना प्रत्यारोपण में सर्जरी की योजना कंप्यूटर तकनीक की मदद से अधिक सटीक तरीके से तैयार की जाती है। इससे घुटने की हड्डियों की कटिंग और इंप्लांट की पोजिशन तय करने में बेहतर सटीकता मिल सकती है। कई मामलों में दर्द व रक्तस्राव कम हो सकता है। इंप्लांट का संतुलन बेहतर होने से घुटने की प्राकृतिक गति हासिल करने में मदद मिलती है। मरीज की रिकवरी और सामान्य गतिविधियों में लौटने की प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत सुगम हो सकती है। परिणाम मरीज की बीमारी, सर्जन के अनुभव और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों पर भी निर्भर करते हैं।
दवा और उपचार
घुटने के दर्द में सिर्फ दवा ही इलाज नहीं
डॉ. मयंक ने कहा कि ऑस्टियोआर्थराइटिस में वजन नियंत्रण, नियमित व्यायाम, फिजियोथेरेपी और जरूरत के मुताबिक दवाएं मददगार हो सकती हैं। कुछ मरीजों में हायलूरोनिक एसिड इंजेक्शन या सर्जरी की जरूरत भी पड़ सकती है।
लक्षण
दर्द को न टालें, चोट के बाद लगातार दर्द, जोड़ में सूजन, चलने में परेशानी, हाथ-पैर पर वजन डालने में दिक्कत।


