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1 मार्च, 2021|12:26|IST

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कश्मीरी पंडित: टीस के 30 साल, अहिंसा के रास्ते हक पाने की जद्दोजहद जारी

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19 जनवरी 1990 को लाखों कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगा दिया गया। कई की हत्या कर दी गई। यह सब सहने के बाद भी उन्होंने हिंसा नहीं की। शिविरों में रहकर संगठन बनाए और आज भी अहिंसा के रास्ते हक पाने की उनकी जद्दोजहद जारी है।

देश-दुनिया में बसे विस्थापित कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीर में वापसी के लिए 30 साल से आंदोलनरत हैं। उन्होंने सरकार से इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाने की मांग की है। कश्मीर समिति दिल्ली के अध्यक्ष समीर चंगू कहते हैं, हमारा तो सबकुछ लुट गया। परिवार-रिश्तेदार और पड़ोसी सब। पीड़ा तो थी ही जबरदस्त गुस्सा भी था। लेकिन हम उनकी तरह जवाब नहीं दे सकते थे। हमने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। हमेशा संविधान के दायरे में रहकर ही बात की।

आजादी के बाद बना संगठन
कश्मीरी समिति दिल्ली का इतिहास कश्मीरी सहायक समिति के तौर पर आजादी के कुछ साल बाद का है। एमएन कौल और हृदय नाथ कुंजरू भी इससे जुड़े हुए थे। ऑल इंडिया कश्मीरी समाज इसी संगठन से निकला है। संगठन कोशुर समाचार नाम से मासिक पत्रिका भी निकालता है।

जंतर-मंतर पर होलोकास्ट डे
19 जनवरी को जनसंहार के विरोध में हर साल जंतर-मंतर पर होलोकास्ट डे मनाया जाता है। दिल्ली-एनसीआर के सैकड़ों कश्मीरी पंडित यहां जुटते हैं और अपना दर्द बयां करते हैं। वह दुनिया को बताते हैं कि आखिर उस रात धरती का जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ कैसा अत्याचार हुआ। 

सरकार की प्राथमिकता, कश्मीरी पंडित घाटी लौटें
अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से कश्मीरी पंडितों को वापस घाटी में बसाने की योजना केंद्र सरकार के एजेंडे में है। लेकिन सरकार इसके लिए वहां कानून व्यवस्था की स्थिति सामान्य होने का इंतजार कर रही है। सरकार को तय करना है कि कश्मीरी पंडितों को मिश्रित बस्तियों में बसाया जाए या उनके लिए अलग बस्तियां बनाई जाएं। सूत्रों ने कहा कि कश्मीरी पंडितों को बसाने की योजना पर लगातार चर्चा चल रही है लेकिन इसे अंतिम रूप देने में थोड़ा वक्त लग सकता है।

सूत्रों ने कहा कि वर्ष 2017 में जिन आठ स्थानों को चिन्हित किया गया था वहां कश्मीरी पंडित जाने को तैयार नहीं हैं। इसलिए उन्हें नए स्थान पर बसाने, रोजगार के लिए आर्थिक मदद मुहैया कराने की योजना पर काम चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संदेश देने के लिए सितंबर 2019 में ह्यृस्टन में कश्मीरी पंडितों के दल से मिले थे और एक नया कश्मीर बनाने का वादा किया था।

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि कश्मीरी पंडित अलग बस्तियों या किसी खास क्षेत्र में लौटना चाहते हैं तो उनसे चर्चा करने के बाद ही फैसला किया जाएगा। सरकार ने 2015 में राज्य सरकार से कश्मीरी पंडितो के लिए अलग जमीन अधिग्रहीत करने को कहा था, लेकिन इस पर काम नहीं हो पाया।

पनुन कश्मीर: अलग होमलैंड की मांग
पनुन कश्मीर ने घाटी में ही कश्मीरी पंडितों के लिए अलग स्वायत्तशासी क्षेत्र की मांग की है, जो झेलम के दोनों ओर फैला हो, जो केंद्र के सीधे अधीन हो। सभी सात लाख विस्थापित कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास, रोजगार की पूरी व्यवस्था की जाए। संगठन के प्रमुख अजय चुरुंगु ने निजी तौर पर नरसंहार और उत्पीड़न विधेयक तैयार किया है, जिसके तहत संपत्ति के नुकसान से लेकर भूमि के अधिकार तक शामिल हैं।

30 साल से सक्रिय
पनुन कश्मीर (हमारा अपना कश्मीर) 1990 में घाटी से कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के बाद सामूहिक पलायन के समय ही अस्तित्व में आया था। इसके आठ से दस हजार सदस्य हैं।

ऑल इंडिया कश्मीरी समाज: राहत पैकेज की घोषणा हो
एआईकेएस के महासचिव एमके पाजन ने मांग रखी है कि अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद कश्मीरी पंडितों के लिए विस्तृत राहत पैकेज की घोषणा हो। विशेषकर जम्मू में राहत शिविरों में रह रहे कश्मीरी पंडितों की माली हालत सुधरे। कश्मीर आए यूरोपीय सांसदों के सामने संगठन ने कट्टरपंथियों दुष्प्रचार का कच्चा चिट्ठा खोला।

पलायन के पहले से चला रहे मुहिम
ऑल इंडिया कश्मीरी समाज (एआईकेएस) का गठन 08-09 मार्च 1980 को हुआ था और जस्टिस पीएन बख्शी इसके पहले प्रमुख थे। यह संगठन कश्मीरी पंडितों के राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक अधिकारों की वकालत करता है। यह सरकारी और गैर सरकारी मंचों पर विस्थापित कश्मीरी पंडितों के राहत एवं पुनर्वास का काम कर रहा है।

ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायसपोरा: छेड़ा ऑनलाइन अभियान
संगठन ने हजारों कश्मीरी पंडितों की हत्या और उनके सामूहिक पलायन को नरसंहार घोषित करने के लिए एक ऑनलाइन अभियान याचिका शुरू की है, जो प्रधानमंत्री मोदी को भेजी जाएगी। इससे 14613 लोग जुड़ चुके हैं। इसमें कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास, रोजगार और शिकायतों को दूर करने के लिए एक ट्रिब्यूनल के गठन की भी मांग है।

दुनिया भर में नेटवर्क
ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायस्पोरा दुनिया भर में फैले कश्मीरी पंडितों का संगठन है, जिसकी स्थापना 1991 में हुई। यह प्रवासी भारतीयों, सरकार औऱ एनजीओ की मदद से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी आवाज उठाने का काम करता है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की थी।

खुद मिसाल कायम की: आंदोलन को जोड़ा था गुवाहाटी से
80 साल के मोतीलाल मल्ला बारामूला जिले के सोपोर में रहते थे और फिलहाल शालीमार गार्डेन में रहते हैं। कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए वे पांच जनवरी 1990 को केंद्र के प्रतिनिधियों से मिले। 30 जनवरी 1990 को  दिल्ली मार्च आयोजित किया था। उस समय गुवाहाटी में भी आंदोलन चल रहा था। उन्होंने नारा दिया था कि कश्मीर हो या गुवाहाटी, अपना देश अपनी माटी। उन्होंने कश्मीरी पंडित कोआर्डिनेशन कमेटी का गठन भी किया है।

अमेरिका से आवाज उठाई
अमेरिका में रह रहे 70 साल के रवि कोतरू का घर श्रीनगर के सेथू शीतलनाथ में उनका घर हुआ करता था। कोतरू लंबे समय से अमेरिका में होने वाले विरोध प्रदर्शनों में शामिल होते रहे हैं।

आज जनसंहार दिवस मनाएंगे कश्मीरी पंडित
दुनिया भर में बसे कश्मीरी पंडितों के संगठन ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायसपोरा (वैश्विक प्रवासी कश्मीरी पंडित) रविवार को जनसंहार दिवस मनाएंगे। 1990 को इसी दिन आतंकियों और कट्टरपंथियों ने उन्हें घाटी से बाहर निकल जाने को मजबूर किया था। न्यूजीलैंड के ऑकलैंड और वेलिंगटन में कश्मीरी पंडितों, सरकार की नीतियों और धारा 370 हटाने के समर्थन में सेमिनार का आयोजन होगा। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के ब्रिसबेन में बसे कश्मीरी पंडित भी विश्व शांति के लिए हवन और प्रार्थना सभाओं का आयोजन करेंगे। ब्रिटेन के लंदन, मैनचेस्टर, ऑक्सफोर्ड और ग्लास्गो सहित अन्य शहरों में कार्यक्रम होंगे। ब्रिटिश संसद के सदस्य, सामाजिक-राजनैतिक संगठनों के प्रमुख 
और भारत के राजनीतिक विश्लेषक इनमें विचार रखेंगे। 

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  • Web Title:Kashmiri Pandits 30 Years Fight For Rights on non violence way