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कश्मीर कथा-3 : दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र सियाचिन पर दबदबे की जंग

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सियाचिन ग्लेशियर भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का बड़ा मुद्दा रहा है। दरअसल, यह दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र पर दबदबे की जंग है। पाक ने रणनीतिक दृष्टि से अहम इस इलाके पर कब्जा जमाने की कई बार कोशिश की लेकिन बर्फीली चोटियों पर सतर्क भारतीय फौज के हाथों उसे मुंह की खानी पड़ी। सियाचिन ग्लेशियर सबसे दुर्गम सैन्य क्षेत्रों में से एक है। पाकिस्तान चीन के साथ मिलकर रणनीतिक दृष्टि से अहम इस क्षेत्र में आधिपत्य जमाने की फिराक में लगा रहता है। लेकिन उसकी हर कोशिश नाकाम हुई है। इस ऊंचाई वाले इलाके में मौजूदगी से भारतीय सेना पाक की हरकतों पर नजर रख पाती है।

सियाचिन का उत्तरी हिस्सा कराकोरम भारत के पास है। पश्चिम का कुछ भाग पाकिस्तान के पास है। सियाचिन का ही कुछ भाग चीन के पास भी है। यहां से लेह, लद्दाख और चीन के हिस्सों पर नज़र रखने में भारत को मदद मिलती है। भारत ने एनजे-9842 के जिस हिस्से पर नियंत्रण किया है, उसे सालटोरो कहते हैं। यह वाटरशेड है यानी इससे आगे लड़ाई नहीं होगी।

पूर्व राजदूत एनएन झा मानते हैं कि पाक का धोखेबाजी का इतिहास भारत को यहां सैन्य उपस्थिति बनाए रखने पर मजबूर करता है। 1999 में कारगिल युद्ध नहीं होता तो बात आगे बढ़ सकती थी। जानकार मानते हैं कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद यह इलाका और भी अहम हो गया है। इस क्षेत्र से कुछ दूरी पर अक्साईिचन का भी क्षेत्र है जो चीन के अवैध कब्जे में है।

पड़ोसी की नीयत ठीक नहीं 

दोनों देशों ने गोलीबारी से ज्यादा मौसम की मार से जानें गंवाई है। यहां हर रोज तकरीबन दस करोड़ रुपये खर्च होते हैं। अरबों रुपये साजोसामान पर खर्च हो चुके हैं।  दोनों देशों के बीच दर्जन भर से ज्यादा इस इलाके को असैन्य क्षेत्र बनाने पर बात हो चुकी है। जानकारों का कहना है कि पाक वास्तविक स्थिति को स्वीकार करे और लिखित भरोसा दे तो बात आगे बढ़ सकती है, लेकिन उसकी मंशा संदिग्ध है।

हर दिन करोड़ों रुपया खर्च करती है सरकार 

भारत सियाचिन की सुरक्षा पर हर दिन करोड़ों रुपये खर्च करता है। लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक 2012-13 में 2280 करोड़, 2013-14 में 1919 करोड़, 2014-15 में 2366 करोड़ और नवंबर-2018 तक  938 करोड़ खर्च हुआ।

पर्वतारोहण के बहाने पाकिस्तान ने शुरू किया था खेल

पाकिस्तान ने 70 और 80 के दशक में पाकिस्तानी छोर से सियाचिन क्षेत्र की चोटियों पर चढ़ने के लिए कई विदेशी अभियानों की अनुमति दी। 1978 में भारतीय सेना ने भी भारतीय नियंत्रण वाले क्षेत्र में पर्वतारोही अभियानों की अनुमति दी। 1982 में ही भारतीय सेना ने अपने कुछ सैनिकों को अंटार्टिका भेजकर प्रशिक्षण दिया था ताकि वे सियाचिन के बफीर्ले मौसम में ढल सकें।

कारगिल युद्ध के जरिये नापाक साजिश

1984 के बाद भी पाक ने ऊंची चोटियों पर कब्जे के असफल प्रयास किए। सबसे बड़ा हमला जनरल परवेज मुर्शरफ के नेतृत्व में हुआ, जिसमें उनकी हार हुई। 1999 के कारगिल युद्ध के पीछे भी यही कारण था। पाकिस्तानी फौज श्रीनगर से लेह को जोड़ने वाले हाईवे पर कब्जा करना चाहती थी जो कि भारत का सियाचिन से संपर्क बनाती है। 2003 में संघर्षविराम समझौता हुआ जो आज तक लागू है।

खुफिया सूचना पर भारत सतर्क 

कर्नल एन. बुल कुमार के नेतृत्व में पहली बार पर्वतारोहियों के लिए राशन सियाचिन भेजा गया। बुल ने ही खुफिया रिपोर्ट दी सितंबर-अक्तूबर 1983 में पाक सेना ने यहां चढ़ने का प्रयास किया। तब सतर्क भारत ने खास पोशाकों के लिए लंदन के आपूर्तिकर्ता को ऑर्डर दिया। जनवरी 1984 में पता लगा कि पाक ने भी ऐसा ही ऑर्डर दिया है।

1984 : ऑपरेशन मेघदूत शुरू

सियाचिन पर नियंत्रण के लिए भारतीय सेना ने 1984 में गोपनीय ऑपरेशन मेघदूत शुरू किया। सेना की एक टुकड़ी ने बफीर्ले दर्रे को पार किया। बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1984 को बाकायदा अभियान शुरू हुआ। खुफिया जानकारी थी कि पाक 17 अप्रैल को चढ़ाई शुरू करेगा। जब पाक सेना वहां पहुंची तो भारतीय सैनिकों ने प्रमुख दो चोटियों सिया ला, बिलाफोंड ला पर कब्जा कर लिया था है। 1987 में तीसरी चोटी ग्योंग ला भी नियंत्रण में आ गई।

विवाद के कारण  

1. नियंत्रण रेखा 

बंटवारे के बाद दोनों देशों के बीच खिंची एक अदृश्य रेखा को बाद में एलओसी माना गया। भारत 740 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा का अंतिम बिंदु ‘एनजे9842’ को मानता है। बाद में पाक एनजे9842 के ऊपर सियाचिन के आधे इलाके पर हक जताने लगा। उसने इसे कराकोरम दर्रे तक खींचने की मांग की।

2. सिंधु जल 

सियाचिन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ताजा जल का एकमात्र स्त्रोत है। नुब्रा घाटी से हिमनद पिघलने से नुब्रा नदी बनती है जो आगे श्योक नदी में मिल जाती है। श्योक नदी अंतत: सिंधु नदी तंत्र में मिलती है जो भारत और पाक के लिए महत्वपूर्ण है। यह नदी लद्दाख से बहते हुए पाक पहुंचती है।

3. कश्मीर मसला

कराची और शिमला समझौते में माना गया कि एनजे9842 के आगे कराकोरम तक का इलाका इंसानों के रहने के लिए व्यावहारिक नहीं है। कश्मीर का एक हिस्सा पाक ने कब्जा लिया था। वह चाहता है कि कराकोरम दर्रे तक नियंत्रण रेखा खिंचे ताकि सियाचिन का एक हिस्सा उसे मिल जाए।

विशेषज्ञ की राय

भारत के लिए लगातार सैन्य मौजूदगी बनाए रखना जरूरी

सियाचिन हमारे लिए इस वक्त रणनीतिक रूप से बहुत अहम हो गया है। ये भारत चीन और पाकिस्तान का त्रिकोण स्थल है। यहां पाकिस्तान हमेशा से कब्जा करके चीन से अपना सीधा संपर्क जोड़ने की कोशिश करता है। चीन और पाकिस्तान दोनों की इस इलाके पर निगाह है। इसलिए हमारे लिए सैन्य मौजूदगी बनाये रखना न सिर्फ जरूरी है बल्कि विशेष सतर्कता की भी जरूरत है। यहां हम सामरिक रूप से ऐसी स्थिति पर हैं कि पाकिस्तान की किसी भी हरकत का मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। चीन से पाकिस्तान को किसी भी तरह का मदद इस इलाके से न मिल पाए इसलिए हमारा प्रभुत्व जरूरी है।

पीके मिश्र, बीएसएफ के पूर्व एडीजी व सामरिक मामलों के जानकार

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