Justice Ranjan Gogoi retires from CJI post who ended the Ayodhya dispute and given verdict in favor of ram mandir - अयोध्या विवाद को विराम देने वाले न्यायमूर्ति रंजन गोगोई CJI के पद से सेवानिवृत्त DA Image
9 दिसंबर, 2019|8:01|IST

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अयोध्या विवाद को विराम देने वाले न्यायमूर्ति रंजन गोगोई CJI के पद से सेवानिवृत्त

cji ranjan gogoi retires from the post

पूर्वोत्तर से सर्वोच्च न्यायिक पद पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति न्यायमूर्ति रंजन गोगोई रविवार को भारत के प्रधान न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हो गए। उन्हें दशकों से चले आ रहे राजनीतिक और धार्मिक रूप से संवेदनशील अयोध्या भूमि विवाद के पटाक्षेप का श्रेय जाता है। 

न्यायाधीश और प्रधान न्यायाधीश के तौर पर न्यायमूर्ति गोगोई का कार्यकाल कुछ विवादों और व्यक्तिगत आरोपों से अछूता नहीं रहा लेकिन यह कभी भी उनके न्यायिक कार्य में आड़े नहीं आया और इसकी झलक बीते कुछ दिनों में देखने को मिली जब उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने कुछ ऐतिहासिक फैसले दिये। 

उनकी अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने नौ नवंबर को अयोध्या भूमि विवाद में फैसला सुनाकर अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया। यह मामला 1950 में उच्चतम न्यायालय के अस्तित्व में आने के दशकों पहले से चला आ रहा था। सर्वोच्च अदालत में उनके कार्यकाल को हालांकि इसलिये भी याद रखा जाएगा कि वह न्यायालय के उन चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों में शामिल थे जिन्होंने पिछले साल जनवरी में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश के काम करने के तरीकों पर सवाल उठाए थे। 

न्यायमूर्ति गोगोई ने बाद में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में टिप्पणी की थी कि “स्वतंत्र न्यायाधीश और आवाज उठाने वाले पत्रकार लोकतंत्र की सुरक्षा की पहली पंक्ति हैं।” न्यायमूर्ति गोगोई ने उसी कार्यक्रम में कहा था कि न्यायपालिका आम आदमी की सेवा के योग्य बनी रहे इसके लिये “सुधार नहीं क्रांति” की जरूरत है। 


प्रधान न्यायाधीश के तौर पर गोगोई का कार्यकाल विवादों से परे नहीं रहा क्योंकि इसी दौरान उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा, जिससे वह बाद में मुक्त हुए। इस बात की संभावना हालांकि ज्यादा है कि उन्हें अयोध्या के फैसले के लिये याद किया जाएगा जिसके तहत राम मंदिर निर्माण के लिये हिंदुओं को 2.77 एकड़ विवादित जमीन सौंपी गई और मुसलमानों को शहर में मस्जिद बनाने के लिये “महत्वपूर्ण स्थल” पर पांच एकड़ जमीन देने को कहा गया। 

प्रधान न्यायाधीश ने उस पीठ की भी अध्यक्षता की थी जिसने 3:2 के बहुमत से उस याचिका को सात न्यायाधीशों वाली बृहद पीठ के समक्ष भेज दिया जिसमें केरल के सबरीमला मंदिर में सभी आयुवर्ग की लड़कियों और महिलाओं को प्रवेश के 2018 के आदेश पर पुनर्विचार का अनुरोध किया गया था। बहुमत के फैसले में मुस्लिम और पारसी महिलाओं के साथ कथित धार्मिक भेदभाव के मुद्दों को भी पुनर्विचार याचिका के दायरे में शामिल कर लिया गया था। 

न्यायमूर्ति गोगोई का नाम मोदी सरकार को दो बार क्लीन चिट देने वाली पीठ की अध्यक्षता करने के लिये भी याद रखा जाएगा। पहले रिट याचिका पर और फिर गुरुवार को उस याचिका में जिसमें राफेल लड़ाकू विमान सौदे में अदालत के 14 दिसंबर 2018 के फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया गया था। पीठ ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को भी राफेल मामले में कुछ टिप्पणियों पर उच्चतम न्यायालय का हवाला देने के लिये चेतावनी दी थी और भविष्य में उनसे ज्यादा सावधानी बरतने को कहा। 

इसके अलावा न्यायामूर्ति गोगोई उस पीठ की भी अध्यक्षता कर रहे थे जिसने यह ऐतिहासिक फैसला दिया कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार कानून के तहत लोक प्राधिकार है, लेकिन “लोकहित” में सूचनाओं का खुलासा करते वक्त “न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ध्यान में रखा जाए”। इसी दिन उनकी अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने विभिन्न न्यायाधिकरणों के सदस्यों के लिये नियुक्ति और सेवाशर्तों के लिये केंद्र द्वारा तय नियमों को पूरी तरह रद्द कर दिया और केंद्र द्वारा वित्त विधेयक 2017 को धन विधेयक के तौर पर पारित करने की वैधता का मामला बृहद पीठ के पास भेज दिया। 

इन फैसलों से इतर न्यायमूर्ति गोगोई को उनके सख्त, साहसी और निडर रुख के लिये जाना जाता है। वह उस पीठ का भी हिस्सा थे जिसने यह निगरानी कर सुनिश्चित किया कि असम (उनके गृह प्रदेश) में राष्ट्रीय नागरिक पंजी की कवायद तय समय-सीमा में पूरी हो। उनके न्यायिक कार्य का शुक्रवार को आखिरी दिन था और उन्होंने उच्चतम न्यायालय के एक नंबर अदालत में उस दिन करीब चार मिनट ही बिताए जिस दौरान सर्वोच्च अदालत में वकीलों की संस्था ने उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की। 

उन्होंने शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये देश के सभी उच्च न्यायालयों और जिला एवं तालुका अदालतों के न्यायाधीशों के साथ संपर्क साधा। न्यायमूर्ति गोगोई ने तीन अक्टूबर 2018 को देश के 46वें प्रधान न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली थी और उनका कार्यकाल 13 महीने से थोड़ा ज्यादा का था। 

प्रधान न्यायाधीश के तौर पर उन्होंने गलती करने वाले न्यायाधीशों के खिलाफ कड़े फैसले लिये और उनके स्थानांतरण की सिफारिश की और उच्च न्यायालय की एक महिला न्यायाधीश को तो इस्तीफा देने के लिये बाध्य होना पड़ा।  
 

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