एक्सक्लूसिव: 02 साल से जज विहीन मुंगेर मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण
एक्सक्लूसिव: 02 साल से जज विहीन मुंगेर मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण एक्सक्लूसिव: 02 साल से जज विहीन मुंगेर मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण

जमुई।/ राकेश सिन्हा । सड़क हादसों के पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने का दावा मुख्यमंत्री के गृह जिले में ही दम तोड़ रहा है। मुंगेर स्थित मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) में पिछले करीब दो वर्षों से पीठासीन पदाधिकारी के अभाव में न सुनवाई हो रही है, न मुआवजा मिल रहा है। नतीजतन मुंगेर प्रमंडल के सभी छह जिलों के सैकड़ो पीड़ित परिवार इंसाफ की आस में वर्षों से चक्कर काट रहे हैं।
सड़क हादसों का प्रभाव
विडंबना यह है कि जिस प्रमंडल में यह न्यायाधिकरण है इस प्रमंडल के जमुई जिला अंतर्गत झाझा विधानसभा क्षेत्र से दामोदर रावत परिवहन मंत्री हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि उनकी नज़रें कब इनायत होती है। हालांकि इस बारे में मंत्री श्री रावत ने कहा कि जल्द ही विभाग के स्तर से न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति कर दी जाएगी ताकि लोगों को सो समय न्याय और मुआवजा मिल सके। सरकार ने त्वरित मुआवजा दिलाने के उद्देश्य से वर्ष 2024 में राज्य के 10 मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण गठित किया था। मुंगेर न्यायाधिकरण के अधीन मुंगेर, जमुई, लखीसराय, शेखपुरा, खगड़िया और बेगूसराय जिले रखे गए। एक अप्रैल 2019 के बाद इन जिलों के हजारों मामले जिला न्यायालयों से स्थानांतरित कर मुंगेर न्यायाधिकरण भेज दिए गए, लेकिन न्याय की रफ्तार शुरू होने से पहले ही व्यवस्था थम गई।
न्यायिक अधिकारियों की कमी
न्यायाधिकरण में पीठासीन पदाधिकारी की नियुक्ति और योगदान में ही करीब साल भर निकल गए। बतौर पीठासीन पदाधिकारी मनोज कुमार सिंह ने 31 दिसंबर 2025 को योगदान दिया। कुछ दिनों बाद अवकाश पर चले गए और नौ फरवरी 2026 को लौटते ही इस्तीफा दे दिया। तब से यह पद रिक्त है। नए न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं होने के कारण एक भी मामले की नियमित सुनवाई नहीं हो पा रही है। हालात यह हैं कि हर महीने नए सड़क हादसों के मामले जुड़ रहे हैं, जबकि पुराने मामलों की संख्या यथावत है। कानून छह माह के भीतर दावा मामलों के निष्पादन का है, लेकिन यहां वर्षों बाद भी सुनवाई शुरू नहीं हो पा रही। सबसे अधिक परेशानी उन परिवारों को हो रही है, जिन्होंने सड़क दुर्घटना में अपने घर के कमाने वाले सदस्य को खो दिया। कई परिवार मुआवजे के अभाव में आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। कोई बेटी की शादी के लिए पैसे का इंतजार कर रहा है तो कोई इलाज के लिए। प्रमंडल मुख्यालय तक आने-जाने में भी गरीब परिवारों की अच्छी-खासी रकम खर्च हो जाती है, लेकिन उन्हें सुनवाई की तारीख तक नहीं मिल पाती।
व्यावहारिकता की आवश्यकता
कानूनविदों का कहना है कि छह जिलों का भार एक ही न्यायाधिकरण पर डालना व्यावहारिक नहीं है। उनका सुझाव है कि मोटर दुर्घटना दावा मामलों की सुनवाई फिर से जिला स्तर पर नामित न्यायालयों में कराई जाए, ताकि पीड़ितों को अपने ही जिले में कम खर्च और कम समय में न्याय मिल सके। अब सबसे बड़ा सवाल सरकार से है। क्या मुख्यमंत्री के गृह जिले में वर्षों से ठप पड़े इस न्यायाधिकरण को फिर से चालू करने के लिए शीघ्र न्यायाधीश की नियुक्ति होगी, या फिर सड़क हादसों के हजारों पीड़ित परिवार यूं ही न्याय और मुआवजे की प्रतीक्षा करते रहेंगे?
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केस स्टडी-1
बरमरिया, लक्ष्मीपुर की बिन्दु देवी के पति बैजू यादव का वर्ष 2017 में सड़क हादसे में मौत हो गई। बैजू ही घर के एकमात्र कमाने वाले थे। उनके जाने के बाद बिन्दु देवी पर चार बेटियों और दो बेटों के भरण-पोषण का पहाड़ टूट पड़ा। उस वक्त बड़ी बेटी महज 12 साल की थी। मुआवजे की आस में इंतजार करते-करते वो बेटी अब शादी के लायक हो गई और दो नाबालिग बच्चे बालिग हो गए। लेकिन न्याय नहीं मिला। आज यह परिवार मजदुरी करके किसी तरह गुजर-बसर कर रहा है। बिन्दु देवी की आंखों में हर दिन एक ही सवाल - "क्या हमारे लिए कभी इंसाफ होगा?"
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केस स्टडी-2
नावाडीह, सिकंदरा की नीतू देवी
वर्ष 2019 में पति प्रवेश कुमार यादव सड़क दुर्घटना में चल बसे। तीन छोटे बच्चों की जिम्मेदारी अकेली नीतू के कंधों पर आ गई। आर्थिक हालत इतनी खराब कि मजदूरी करके घर चलाना पड़ रहा है। बेटी और बेटा अब 16 साल के हो गए हैं। घर में जवान बेटी है, हाथ पीले करने की चिंता हर पल सताती है। नीतू कहती हैं - "मुआवजा मिल जाता तो बच्चों का भविष्य संवर जाता, पर यहां तो तारीख भी नसीब नहीं हो रही।"
केस स्टडी-3
नगर परिषद क्षेत्र, बिहारी निवासी अजन्ता देवी
के पति अंजेश सिंह की मृत्यु मार्च 2024 में ट्रैक्टर की ठोकर मारने से हो गई थी। अंजेश ही बूढ़े माता-पिता ,भाई , पत्नी और तीन बच्चों का सहारा थे। कमाई सीमित थी, खर्च ज्यादा। उनके जाने के बाद पूरा बोझ अंजना पर आ गया। घर में दो बेटियां जवान हैं, शादी की फिक्र ने नींद उड़ा दी है। खपरैल के एक कमरे में छह लोगों का पेट पालते हुए अजन्ता देवी की आंखें भर आती हैं - "अगर वो होते तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता। बस मुआवजा मिल जाए तो बच्चों का जीवन बच जाए।वो आज भी जज की नियुक्ति और त्वरित न्याय की टकटकी लगाए बैठी हैं।
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केस स्टडी-4
चानन, जिला- लखीसराय के राजमिस्त्री अनिल पंडित का 19 वर्षीय बेटा तीन साल पहले सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया। सिर में चोट के कारण वह पिछले तीन वर्षों से बिस्तर पर है। शुरुआत में इलाज पटना में चला, लेकिन पैसे के अभाव में इलाज बीच में ही रुक गया। डाक्टरों ने कहा लाखों का खर्च आएगा। मां-बाप ने मुंगेर मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण में मुआवजे के लिए दावा दाखिल किया है। उनकी उम्मीद है कि मुआवजा मिलेगा तो बेटे का इलाज हो सकेगा। लेकिन यहां जज ही नहीं है तो सुनवाई कहां से होगी।


