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बोफोर्स तोप सौदा मामला: बीजेपी नेता की अपील पर सुनवाई से हटे जज खानविलकर

Bofors case: CBI moves SC against Delhi HC order quashing charges against accused

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ए एम खानविलकर ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील 64 करोड़ रुपए के बोफोर्स भुगतान मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया। न्यायमूर्ति खानविलकर, प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ का हिस्सा थे। उन्होंने मामले की सुनवाई से अलग रहने का विकल्प चुनने का कोई कारण नहीं बताया।

इस पीठ में न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे।

पीठ ने कहा कि मामले की 28 मार्च को सुनवाई के लिए नई पीठ का गठन किया जाएगा। 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 31 मई 2005 को फैसला सुनाते हुए मामले के सभी आरोपियों के खिलाफ सभी आरोप खारिज कर दिए थे। भाजपा नेता अजय अग्रवाल ने अदालत के इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी, जिसकी सुनवाई इस पीठ को करनी थी।

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1437 करोड़ का करार 

भारत और स्वीडन की हथियारों का निर्माण करने वाली एबी बोफोर्स के बीच सेना के लिए 155 एमएम की 400 हाविट्जर तोपों की आपूर्ति के बारे में 24 मार्च, 1986 में 1437 करोड़ रुपये का करार हुआ था। इसके कुछ समय बाद ही 16 अप्रैल, 1987 को  स्वीडिश रेडियो ने दावा किया था कि इस सौदे में बोफोर्स कंपनी ने भारत के शीर्ष राजनीतिकों और रक्षाकार्मिकों को दलाली दी। 

इस मामले में 22 जनवरी, 1990 को सीबीआई ने एबी बोफोर्स के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन आर्दबो, कथित बिचौलिये विन चड्ढा और हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ प्राथिमकी दर्ज की थी। इस मामले में जांच ब्यूरो ने 22 अक्तूबर, 1999 को चड्ढा, ओतावियो क्वोत्रोक्कि, तत्कालीन रक्षा सचिव एस के भटनागर, आर्दबो और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ पहला आरोप पत्र दायर किया था। 

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सीबीआई  ने मामले में आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ सारे आरोप निरस्त करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के 2005 के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 

भाजपा नेता ने की है अपील
भाजपा नेता वकील अजय अग्रवाल ने 31 मई, 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी है। इस फैसले में हाईकोर्ट ने मामले में दायर एफआईआर निरस्त कर दी थी। उच्च अदालत ने कहा था कि महज 64 करोड़ की दलाली के मामले में सीबीआई ने जांच के नाम पर 250 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। इस दौरान कोर्ट में सीबीआई ने चुप्पी साधे रखी। 

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कोर्ट ने जनवरी में अग्रवाल के इस मामले में हस्तक्षेप पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि एक आपराधिक मामले को तीसरे व्यक्ति की याचिका पर कैसे खोला जा सकता है। आप याचिका कैसे दायर कर सकते हैं, जब सीबीआई ने हाईकोर्ट को फैसला स्वीकार कर अपील नहीं दायर करने का फैसला किया है। इसके बाद पीठ ने सीबीआई के लिए पेश हो रहे एएसजी मनिंदर सिंह से पूछा कि आपने पिछले 12-13 सालों से अपील दायर नहीं की है अब आप क्या करना चाहते हैं। सिंह ने कहा कि यह सही है कि सीबीआई ने समय से अपील दायर नहीं की। एक बार विशेष अनुमति याचिका दायर की गई थी लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया गया। 

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अग्रवाल ने कहा कि सार्वजनिक हित को देखते हुए उन्हें इस मामले में अपील दायर करने की अनुमति दी जाए क्योंकि कोई भी अपराध बिना दंड के नहीं रहना चाहिए। इस पर कोर्ट ने कहा कि सीबीआई ने अपील दायर नहीं की है इसलिए उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप करने का अधिकार साबित करना होगा। हम हर किसी को आपराधिक मामले में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकते। आपराधिक न्यायशास्त्र का यह सिद्धांत नहीं है। आपको हमें कानून की सीमा के अंदर संतुष्ट करना होगा। भारत स्वीडन के बीच हुए बोफोर्स तोप सौदे में दलाली का खुलासा 1987 में हुआ था। इस करार में 64 करोड़ रुपये दलाली लेने के आरोप लगे हैं। 

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  • Web Title:Justice A M Khanwilkar recuses from hearing Bofors case in Supreme Court