देर से आई हूं...पर अब आती रहूंगी : जूही बब्बर
वाराणसी में ख्यात रंगमंच कलाकार जूही बब्बर ने कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि वे अंतत: बनारस आईं। उन्होंने अपने नाटक 'एक लम्हा जिंदगी का' के बारे में बात की और बताया कि थियेटर ने उन्हें नई पहचान और प्यार दिया है। उनका ध्यान फिल्मी करियर से थियेटर की ओर होने के अनुभव को साझा किया।

वाराणसी, मुख्य संवाददाता। निश्चित रूप से मुझे इस बात का बहुत ग़म है कि मैं बहुत देर से बनारस आई हूं, लेकिन इस बात की बहुत ज्यादा खुशी है कि अंतत: मैं बनारस आ गई हूं। वह भी अपना पसंदीदा नाटक लेकर। अब मुझे विश्वास हो गया है कि मुझे बार-बार बनारस आने का मौका मिलेगा। मैं देश की सांस्कृतिक राजधानी में अपने और भी पसंदीदा नाटक लेकर आती रहूंगी। यह कहना है ख्यात रंगमंच कलाकार एवं सिने अभिनेत्री जूही बब्बर का। राज बब्बर और नादिरा बब्बर की पुत्री जूही एक व्यावसायिक मंचन के सिलसिले में शनिवार को बनारस आई थीं।
प्रस्तुति से पहले कैंटोनमेंट स्थित होटल रेडिसन में मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह सच है कि मेरा फिल्मी करियर आशा के अनुरूप नहीं रहा। मेरी पहली फिल्म ‘काश आप हमारे होते’ बहुत ही बेहतरीन कहानी होने के बाद भी सफल नहीं हुई। उसके बाद की भी कुछ और फिल्मों का हस्र ऐसा ही रहा। इससे पहले कि मैं अवसाद में चली जाती मैंने अपना फोकस थियेटर की ओर कर दिया। बेटे के जन्म के बाद कुछ वर्षों तक मैंने पूरा समय घर में ही व्यतीत किया। चार वर्ष पूर्व जब से पुन: काम शुरू किया है, थियेटर ने मुझे बहुत प्यार और अलग पहचान दी है। कुछ समय पूर्व मैंने अपने नाटक ‘एक लम्हा जिंदगी का’ का मंचन जौनपुर में किया था। वह अनुभव मेरे लिए बहुत खास था। यह नाटक मेरे नाना-नानी की प्रेम कहानी है। इसमें मैं अपनी नानी की भूमिका करती हूं। मेरे नाना-नानी जौनपुर के कलापुर के रहने वाले थे। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि अभिनय सीखने के लिए मुझे एनएसडी नहीं जाना पड़ा। मेरे घर में ही एक नहीं दो-दो ‘एनएसडी’(अभिनेता राज बब्बर और अभिनेत्री नादिरा बब्बर) हैं। उन्होंने कहा कि थियेटर की अपनी सीमाएं होते हुए भी इसमें जीवन को निखारने की असीम संभावनाएं हैं।


