सूचना आयोग के कामकाज पर सिविल सोसाइटी ने उठाए सवाल
झारखंड राज्य सूचना आयोग के कार्यों पर गिरिडीह की सिविल सोसाइटी ने पारदर्शिता की मांग की है। संस्था ने राज्य में सूचना आयुक्तों द्वारा लंबित मामलों की संख्या और उनके निपटारे के लिए समयबद्ध कार्ययोजना की जानकारी मांगी है। इसके साथ ही, आयुक्तों के वेतन और सुविधाओं का भी ब्योरा मांगा गया है।

गिरिडीह। झारखंड राज्य सूचना आयोग के कामकाज, लंबित द्वितीय अपील एवं शिकायत वादों तथा सूचना आयुक्तों पर होने वाले सार्वजनिक खर्च को लेकर सिविल सोसाइटी गिरिडीह ने सरकार और आयोग से पारदर्शी जवाब मांगा है। संस्था के अध्यक्ष निर्मल झुनझुनवाला ने कहा कि सूचना का अधिकार लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में आयोग में लंबित मामलों का समयबद्ध निष्पादन जरूरी है। सिविल सोसाइटी के अनुसार राज्य में 10 जून 2026 को चार सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हुई और 1 जुलाई को उन्हें शपथ दिलाई गई। संस्था ने कहा कि उसका उद्देश्य किसी अधिकारी या सरकार की नीयत पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक संस्था की संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
सूचनाओं की सुनवाई
संस्था ने सरकार और आयोग से पूछा है कि एक जुलाई के बाद चारों सूचना आयुक्तों के समक्ष कितने मामलों की सुनवाई हुई, इनमें द्वितीय अपील और शिकायत वादों की संख्या कितनी रही तथा अब तक कितने मामलों का अंतिम निष्पादन हुआ। इसके साथ ही वर्तमान में लंबित मामलों की संख्या और छह माह, एक वर्ष, दो वर्ष अथवा उससे अधिक पुराने मामलों का अलग-अलग आंकड़ा सार्वजनिक करने की मांग की गई है। सिविल सोसाइटी ने आयोग से लंबित मामलों के कारण और उनके शीघ्र निपटारे के लिए बनाई गई समयबद्ध कार्ययोजना भी सार्वजनिक करने को कहा है। संस्था ने आयोग के मानव संसाधन, कार्यालयीन व्यवस्था और प्रशासनिक सुविधाओं की पर्याप्तता पर भी जानकारी मांगी है।
वेतन और सुविधाएं
सिविल सोसाइटी ने सूचना आयुक्तों को मिलने वाले वेतन-भत्ते और अन्य सुविधाओं पर होने वाले सार्वजनिक खर्च का ब्योरा भी मांगा है। संस्था के अनुसार उपलब्ध जानकारी में एक सूचना आयुक्त को करीब 2.25 लाख रुपये बेसिक वेतन, 1.35 लाख रुपये डीए और 45 हजार रुपये एचआरए सहित करीब 4.05 लाख रुपये प्रतिमाह मिलने की बात सामने आती है। इसके अलावा वाहन, आवास, चिकित्सा और संचार जैसी सुविधाओं पर होने वाले खर्च का विवरण भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। संस्था ने कहा कि सवाल किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था के परिणाम और जवाबदेही को लेकर है। जनता के पैसे से चलने वाली संस्था का कामकाज जनता के सामने पारदर्शी होना चाहिए। उन्होंने आयोग से नियमित रूप से लंबित, निष्पादित और सुनवाई किए गए मामलों के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की।


