पूरी कीमत चुकाने के बाद भी नहीं मिला फ्लैट, बैंक को ब्याज भुगतान का आदेश

हिन्दुस्तान, जमशेदपुर
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झारखंड हाईकोर्ट ने महिला को 30.90 लाख रुपये पर 6% ब्याज देने का आदेश बरकरार रखा। बैंक ऑफ बड़ौदा ने ई-नीलामी के बाद समय पर सेल सर्टिफिकेट नहीं दिया। महिला ने हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसके बाद कोर्ट ने बैंक की दलीलें खारिज कर दीं और उचित ब्याज के साथ राशि लौटाने का आदेश दिया।

पूरी कीमत चुकाने के बाद भी नहीं मिला फ्लैट, बैंक को ब्याज भुगतान का आदेश

झारखंड हाईकोर्ट ने बैंक की ई-नीलामी में फ्लैट खरीदने वाली महिला को 30.90 लाख रुपये की राशि पर छह प्रतिशत सालाना ब्याज देने के आदेश को बरकरार रखा है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने बैंक ऑफ बड़ौदा की अपील खारिज कर दी। बैंक ने एकल पीठ के 17 जून के आदेश को चुनौती दी थी। मामला जमशेदपुर के मानगो स्थित चंद्रावती नगर के दलमा एन्क्लेव के एक फ्लैट से जुड़ा है। बैंक ऑफ बड़ौदा ने 14 सितंबर 2022 को इस संपत्ति की ई-नीलामी की थी। इसमें शिप्रा शिखा ने 30.90 लाख की सबसे ऊंची बोली लगाई थी।

उन्होंने 15 से 26 सितंबर 2022 के बीच बैंक को पूरी रकम जमा कर दी। राशि जमा करने के बाद महिला ने बैंक से सेल सर्टिफिकेट जारी करने के लिए कई बार ई-मेल किया, लेकिन उन्हें समय पर सर्टिफिकेट और फ्लैट का कब्जा नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने जमा राशि ब्याज सहित वापस करने की मांग की। बैंक ने बाद में नीलामी रद्द कर दी और 6 अप्रैल 2024 को 30.90 लाख रुपये वापस किए। महिला की रकम करीब डेढ़ साल तक बैंक के पास रही।इसके बाद महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। एकल पीठ ने बैंक को 30.90 लाख पर छह प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज देने का निर्देश दिया था। फैसले के खिलाफ बैंक ने खंडपीठ में अपील की। बैंक की ओर से दलील दी गई कि ई-नीलामी की शर्तों में ब्याज देने का कोई प्रावधान नहीं था। महिला ने खुद रकम वापस मांगी थी और यह अंडरटेकिंग भी दी थी कि वह भविष्य में नीलामी से संबंधित कोई दावा नहीं करेगी। इसलिए उसे ब्याज नहीं दिया जाना चाहिए। खंडपीठ ने बैंक की दलील स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि पूरी राशि जमा करने के बावजूद कई महीनों तक संपत्ति का कब्जा महिला को नहीं दिया गया। महिला खराब स्वास्थ्य और इलाज की जरूरत के कारण पैसे वापस चाहती थी। ऐसी स्थिति में उससे लिया गया अंडरटेकिंग दबाव में लिया गया प्रतीत होता है। अदालत ने कहा कि उचित समय के भीतर संपत्ति का कब्जा दिलाना बैंक की जिम्मेदारी थी। ऐसा नहीं होने पर बैंक को जमा राशि उचित ब्याज के साथ वापस करनी चाहिए थी। बैंक ने यह रकम कई महीनों तक अपने पास रखी। खंडपीठ ने कहा कि बिना कानूनी आधार के किसी की रकम अपने पास रखने पर उसे ब्याज सहित लौटाना होगा। अदालत ने एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया और बैंक ऑफ बड़ौदा की एलपीए खारिज कर दी।

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