टाइटल साबित किए बिना मुआवजा नहीं मिलेगा : हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो स्टील प्लांट के लिए बिना अधिग्रहण की गई ज़मीन के मुआवजे के लिए प्रार्थियों की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि ज़मीन के मालिकाना हक को साबित करने तक मुआवजे का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रार्थियों ने कहा था कि ज़मीन को बिना कानूनी अधिग्रहण के कब्जा किया गया था।

रांची, विशेष संवाददाता। झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो स्टील प्लांट के लिए कथित रूप से बिना अधिग्रहण इस्तेमाल की गई जमीन के बदले मुआवजा देने का निर्देश देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब तक प्रार्थी विवादित जमीन पर अपना कानूनी मालिकाना हक (टाइटल) साबित नहीं कर देते, तब तक मुआवजे का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने बोकारो जिले के चार प्रार्थियों की याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि जमीन के मालिकाना हक से जुड़े विवाद संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत रिट याचिका में तय नहीं किए जा सकते।
ऐसे मामलों का फैसला सक्षम सिविल कोर्ट ही करेगा। प्रार्थियों ने अदालत को बताया कि 1950 और 1960 के दशक में बोकारो स्टील प्लांट की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर जमीन का अधिग्रहण किया गया था। उनका आरोप था कि मौजा कनारी की करीब 561 एकड़ जमीन बिना कानूनी अधिग्रहण और बिना मुआवजा दिए प्लांट की चहारदीवारी बनाकर कब्जे में ले ली गई। उनका यह भी कहना था कि राज्य सरकार की एक समिति ने उन्हें जमीन का वास्तविक दावेदार माना था, फिर भी उन्हें आज तक मुआवजा नहीं मिला। वहीं, राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि विवादित जमीन राजस्व अभिलेखों में गैरमजरूआ खास (सरकारी जमीन) के रूप में दर्ज है। वर्ष 1968 में इसे सरकारी संपत्ति मानते हुए बिना मुआवजे के बोकारो स्टील प्लांट को हस्तांतरित किया गया था। सरकार ने यह भी कहा कि प्रार्थियों ने जमीन पर मालिकाना साबित करने वाला कोई वैध दस्तावेज पेश नहीं कर सके और न ही उनके पक्ष में कभी भूमि अधिग्रहण का अवार्ड पारित हुआ।


