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29 जनवरी, 2020|9:18|IST

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जश्न-ए-रेख़्ता में बोले जावेद अख्तर, बदलाव से इंकलाब होगा

javed akhtar photo ht

दुनिया में किसी कविता और गजल ने इंकलाब नहीं किया है। ये सिर्फ नारे हैं, जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है। इंकलाब परिवर्तन से होगा, जिसके लिए जोश और कोशिश होनी चाहिए। ये बातें मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में शनिवार को गीतकार जावेद अख्तर ने जश्न-ए-रेख्ता में कही। जावेद अख्तर ने कहा कि लोग अपने समुदाय में गुम और खुश हैं। उर्दू भाषा पर उन्होंने कहा कि उर्दू का प्रभाव कम नहीं हो रहा, बल्कि जुबान कम हो रही है, जो दुख की बात है।

साहिर अपनी मां के सबसे करीब थे : शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी की बात करते हुए जावेद अख्तर ने बताया कि वह अपनी मां के सबसे करीब थे। कोई भी काम बिना मां की इजाजत के नहीं करते थे। हर जानकारी अपनी मां को दिया करते थे। 45 वर्ष की उम्र में भी उनका अपनी मां से गहरा नाता था। जब वह छोटी उम्र में थे तभी उनकी मां का तलाक हो गया था। साहिर ने गरीबी में अपना जीवनयापन किया था। जावेद अख्तर ने साहिर की निजी जिंदगी से जुड़ी कई बातें श्रोताओं संग साझा की। उन्होंने बताया कि साहिर की नज्म युवाओं को उनसे सीधा जोड़ती थी। वह उम्रदराज होने के बावजूद ऐसी नज्म लिखते थे, जैसे कि किसी युवा ने लिखी हो। उनकी लेखनी में प्रकृति से उनका लगाव दिखता था। 

ये कार्यक्रम हो रहे
जश्न-ए-रेख्ता में दास्तानगोई, नाटक, कव्वाली, गजल गायकी, फिल्म स्क्रीनिंग, साहित्यिक चर्चाओं, मुशायरा, बैतबाजी (उर्दू कविता प्रतियोगिता), वाद-विवाद प्रतियोगिता, प्रदर्शनी, उर्दू गद्य और काव्य पाठ आदि कार्यक्रम हो रहे हैं। 

चांदनी प्रदूषण में कैसे दिखेगी?
जावेद अख्तर ने कहा कि आज लोग प्रकृति को भूलते जा रहे हैं। बहुत कम लोगों को चौदवीं के चांद के बारे में पता होगा। लोगों का प्रकृति से नाता टूटता जा रहा है, क्योंकि वो सीमेंट के जंगल में रहते हैं, उन्हें चांदनी प्रदूषण में कहां से दिखेगी। जावेद अख्तर ने कहा कि अगर अपने काम की इज्जत दिल में नहीं है तो आप उसे अच्छा नहीं कर सकते हैं। काम कोई छोटा नहीं होता है। उन्होंने कहा कि बिना उम्मीद के ख्वाब नहीं देखे जा सकते हैं। करिश्मा अगर परिभाषित हो जाता तो करिश्मा नहीं रह जाता है।

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  • Web Title:Jashn e Rekhta Javed Akhtar Says Need Transformation For Revolution