15 से जैन मंदिरों में गूंजेगा दशलक्षण धर्म का संदेश
जैन समाज के पवित्र पर्व दशलक्षण की तैयारियां शुरू हो गई हैं। यह पर्व 15 से 25 सितंबर तक मनाया जाएगा, जिसमें श्रद्धालु आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन करते हैं। दशलक्षण पर्व के दौरान जैन धर्म के दस उत्तम धर्मों की आराधना की जाती है। पर्व का उद्देश्य आत्मा को कषायों से मुक्त करना है।

भाद्रपद मास के आगमन के साथ ही जैन समाज के सबसे पवित्र और आत्मशुद्धि के पर्व दशलक्षण की तैयारियां शुरू हो गई हैं। शहर के जैन मंदिरों में इस पर्व को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। दिगंबर जैन समाज में इस वर्ष दशलक्षण पर्व 15 सितंबर से 25 सितंबर तक मनाया जाएगा। पंचांगों में तिथि भेद के कारण इसकी शुरुआत 16 सितंबर से मानी जा रही है। दशलक्षण पर्व को पर्युषण पर्व भी कहा जाता है। पर्युषण का अर्थ है परि अर्थात चारों ओर से धर्म की आराधना। यह पर्व केवल बाहरी धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का अवसर माना जाता है। इन दस दिनों में श्रद्धालु क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को कम करते हुए आत्मा के स्वाभाविक गुणों को जागृत करने का प्रयास करते हैं。
दस दिनों में दस धर्मों की आराधना
दशलक्षण पर्व के दौरान जैन धर्म के दस उत्तम धर्मों की आराधना की जाती है। इनमें उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य शामिल हैं। उत्तम क्षमा के माध्यम से क्रोध को जीतकर सभी को क्षमा करने, उत्तम मार्दव से अहंकार का त्याग कर विनम्र बनने, उत्तम आर्जव से छल-कपट छोड़कर सरल बनने और उत्तम शौच से लोभ का त्याग कर संतोष अपनाने की प्रेरणा दी जाती है। इसी प्रकार उत्तम सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
मंदिर में होंगे विशेष धार्मिक आयोजन
प्रवक्ता सुनील जैन ने बताया कि दशलक्षण पर्व के दौरान जैन मंदिरों में भगवान जिनेंद्र देव का अभिषेक, शांतिधारा, दशलक्षण धर्म की विशेष पूजा, स्वाध्याय, सामायिक, तप, ध्यान और प्रवचन होंगे। श्रद्धालु इन दिनों में अपनी दिनचर्या में धार्मिक गतिविधियों को बढ़ाकर आत्मसंयम और आत्मचिंतन का अभ्यास करेंगे। जैन मान्यता के अनुसार दशलक्षण धर्म किसी व्यक्ति विशेष के गुण नहीं हैं, बल्कि शुद्ध आत्मा के स्वाभाविक गुण माने गए हैं। इन गुणों की आराधना का उद्देश्य आत्मा को कषायों और सांसारिक आसक्तियों से मुक्त कर शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाना है।
भाद्रपद का पर्व माना जाता है मुख्य
दशलक्षण पर्व वर्ष में तीन बार माघ, चैत्र और भाद्रपद मास में पंचमी से चतुर्दशी तक आता है, लेकिन इनमें भाद्रपद मास का दशलक्षण पर्व मुख्य माना जाता है। पर्व की समाप्ति के बाद 27 सितंबर को क्षमावाणी पर्व मनाया जाएगा, जिसमें जैन समाज के लोग एक दूसरे से क्षमा मांगते हुए ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ की भावना व्यक्त करेंगे।


