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'शरीयत कानून में भी तीन तलाक कहकर अलग होना वैध नहीं'

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शरीयत कानून (मुस्लिम पर्सनल लॉ) के तहत सिर्फ तीन तलाक कहकर पत्नी से अलग होने का फैसला लेना वैध नहीं है। इसके लिए एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाता है। अमूमन शरीयत कानून की जानकारी ना होने के कारण विशेष समुदाय के लोग तीन तलाक बोलकर पत्नी को त्यागने का निर्णय करते हैं, जो कि गैरकानूनी है। अदालत ने यह टिप्पणी एक युवक की तीन तलाक को मंजूर करने संबंधी याचिका को खारिज करते हुए की।

रोहिणी स्थित फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज डॉ. सुधीर कुमार जैन की अदालत ने शरीयत कानून का हवाला देते हुए तीन तलाक की याचिका को नामंजूर किया है। अदालत ने अपने फैसले में शरीयत कानून की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि बेशक मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक पुरुष को तलाक-ए-बिद्दत(तीन तलाक) के तहत पत्नी से अलग होने का अधिकार दिया गया है। मगर इसके लिए भी इस पुरुष (पति) को एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।

किसी एक कड़ी की कमी की वजह से यह तलाक मुक्कमल नहीं माना जाता। अदालत ने यह भी कहा कि शरीयत की पूरी जानकारी ना होने के कारण तलाक-ए-बिद्दत जैसे अधिकार का दुरुपयोग होता है। अदालत ने कहा कि इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है। तलाक-ए-बिद्दत की एक भी शर्त को पूरा नहीं किया गया और पत्नी से छुटकारा पा लिया गया। 

तीन तलाक के लिए जरूरी शर्तें

-तीन तलाक बोलते समय पति के पास कोई एक ठोस वजह का होना अनिवार्य। छोटी-मोटी घरेलू बातें तीन तलाक का आधार नहीं हो सकतीं। इस तरह के तलाक के लिए तार्किक वजहों का होना जरूरी है।

-तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक) के समय गवाह के तौर पर पति और पत्नी दोनों के परिवार से एक-एक सदस्य का मौके पर होना जरूरी है।

-तीन तलाक बोले जाने के बाद पति-पत्नी के परिवार से मौजूद सदस्यों की तरफ से दोनों के बीच मध्यस्थता आवश्यक है, ताकि समझौते के प्रयास कराए जा सकें।

-तमाम प्रयासों के बाद समझौता ना होने पर मौके पर ही मेहर की रकम महिला को अदा की जानी चाहिए

चार साल बाद अदालत ने अवैध ठहराया तीन तलाक

अदालत का यह फैसला हैदरपुर निवासी एक युवक की याचिका पर आया है। इस युवक का निकाह 30 मई 2004 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की रहने वाली युवती से हुआ था। युवक का कहना था कि पत्नी उसे प्यार नहीं करती, उसका ध्यान नहीं रखती और ना ही उसका सम्माना करती है। इसी कारण 25 दिसंबर 2015 को इस युवक ने पत्नी को तीन बार तलाक कहकर उससे अलग होने का फैसला किया था। हालांकि, पत्नी छह दिन बाद ही उसके पास वापस आ गई थी। उसने माफी मांगकर साथ रहने की इच्छा जताई थी। मगर इस युवक का कहना है कि वह अपने धर्म के मुताबिक तीन बार तलाक कह चुका है, इसलिए अब यह महिला उसकी पत्नी नहीं है। मगर अदालत ने पति-पत्नी के बीच पिछले चार साल से चल रही असमंजस की स्थिति को साफ कर दिया है। अदालत ने इस तीन तलाक को कानूनी मंजूरी देने से इंकार किया है। अदालत ने इस युवक की तलाक की डिक्री देने की मांग को ठुकरा दिया।

‘प्यार नहीं करती’ तलाक का ठोस आधार नहीं

अदालत ने अपने निर्णय में पति-पत्नी के संबंधों का हवाला देते हुए कहा कि जरूरी नहीं है कि हर मसले को लेकर पति-पत्नी में सहमति हो। प्यार नहीं करती, सम्मान नहीं करती यह घरेलू बातें हैं। इनके आधार पर आप अपने एक ऐसे अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते, जिससे दूसरे की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि शरीयत कानून में साफ लिखा है कि तलाक ए बिद्दत के लिए ठोस आधार होना चाहिए, जबकि इस मामले में वादी पति के पास तीन तलाक की कोई खास वजह नहीं है। दोनों तरफ के गवाहों की कमी है। इनके बीच मध्यस्थता नहीं की गई। गवाहों के बयान विरोधाभाषी हैं। अदालत ने भारत जैसे देश में महिलाओं में अपने अधिकारों को लेकर कानून की पर्याप्त जानकारी नहीं है। इसका उन्हें कई बार नुकसान उठाना पड़ता है, लेकिन अदालतें उनके अधिकारों की रखा के लिए हमेशा प्रयासरत रहती हैं।

तीन तरह से पुरुष ले सकता है तलाक

-तलाक ए बिद्दत(तीन तलाक) जो कि एक बार में ही बोला जा सकता है
-तलाक ए हसन (यह अलग-अलग अवधि के इंतजार के बाद दिया जा सकता है )
-तलाक ए अहसान(पति को पत्नी की इद्दत अवधि में उससे दूर रहना होगा, अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है तो दोनों का रिश्ता फिर से कायम हो जाएगा)

क्या कहते हैं रीति-रिवाह

-पति अलग होना चाहे तो उसे ‘तलाक’ कहते हैं
-पत्नी अगर पति से अलग होना चाहे तो वह ‘खुला’ ले सकती है
-यदि पति-पत्नी सहमति से अलग होते हैं तो उसे ‘मुबरा’ कहा जाता हैं
-अगर पत्नी कानूनी तरीके से पति से अलग होना चाहती है तो वह ‘फस्ख’ ले सकती है ( हालांकि चारों ही तरह से अलग होने की शर्तें भी अलग-अलग हैं)

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