देशज ज्ञान परंपराओं को अकादमिक विमर्श का विषय बनाने की जरूरत : प्रो. हिमांशु
ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज में जनजातीय अध्ययन केंद्र की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। संगोष्ठी में देश-विदेश के शिक्षाविदों ने जनजातीय विरासत और देशज ज्ञान परंपराओं पर विचार प्रस्तुत किए। प्रमुख वक्ता ने इन्हें ज्ञान के बड़े स्रोत के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज में शुक्रवार को जनजातीय अध्ययन केंद्र की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। ‘देशज ज्ञान परंपराओं का पुनरुद्धार: भारत में जनजातीय विरासत, सांस्कृतिक निरंतरता एवं सामाजिक रूपांतरण’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में देश-विदेश के शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने विचार रखे। मुख्य अतिथि भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के निदेशक प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी ने कहा कि देशज ज्ञान परंपराओं के साथ लंबे समय तक हाशिए का व्यवहार हुआ। इन परंपराओं को शिक्षा, समाज और दुनिया की समस्याओं के समाधान में उपयोग करने की जरूरत है। समकालीन अकादमिक विमर्श में देशज ज्ञान परंपराओं पर नए दृष्टिकोण, शोध और अध्ययन जरूरी हैं। संस्कृति विकासशील है और अपनी जड़ों को बनाए रखकर ही संरक्षित रह सकती है।
संगोष्ठी की विषय वस्तु
भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. डी.आर. साहू ने कहा कि जनजातीय विरासत आधुनिकता के प्रतिरोध में नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ाने में सहायक है। ज्ञान परंपराओं को द्विआधारी दृष्टिकोण से देखने के बजाय इनके बीच संबंध स्थापित करने की जरूरत है। मुख्य वक्ता यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया, इंग्लैंड के प्रो. डेनियल रायक्राफ्ट ने भारतीय देशज ज्ञान परंपराओं को ज्ञान का बड़ा स्रोत बताया। उन्होंने जनजातीय समुदायों को ज्ञान के धारक के रूप में मान्यता देने और बहुलतावादी शिक्षाशास्त्र अपनाने पर जोर दिया।
संगोष्ठी का महत्व
प्राचार्य प्रो. आनंद शंकर सिंह ने कहा कि संगोष्ठी जनजातीय संस्कृति, जीवन-मूल्यों और परंपराओं को नए सिरे से समझने का अवसर देगी। दूसरे दिन छह प्लेनरी और 16 तकनीकी सत्रों में 650 शोधपत्र पढ़े जाएंगे। संयोजक डॉ. शाइस्ता इरशाद ने विषय की पृष्ठभूमि रखी।


