संसदीय समिति की पहल के बाद मध्यस्थता परिषद का गठन
केंद्र सरकार ने मध्यस्थता की कार्यवाही को विनियमित करने के लिए 'मध्यस्थता परिषद' का गठन किया है। यह संसदीय समिति की सिफारिश पर आधारित है। परिषद का उद्देश्य संस्थागत विवाद समाधान को बढ़ावा देना और मध्यस्थता सेवा प्रदाताओं को मान्यता देना है। यह अदालतों के बाहर विवादों के समाधान में मदद करेगी।

केंद्र सरकार ने कानून बनाए जाने के करीब तीन साल बाद देश में मध्यस्थता की कार्यवाही को विनियमित करने के लिए ‘मध्यस्थता परिषद’ का गठन कर दिया है। यह कदम एक संसदीय समिति की सिफारिश के बाद उठाया गया है। केंद्रीय कानून मंत्रालय ने गुरुवार रात जारी अधिसूचना में मध्यस्थता अधिनियम, 2023 के तहत परिषद के गठन की घोषणा की। परिषद संस्थागत विवाद समाधान को विनियमित करने और बढ़ावा देने का काम करेगी। इसके अलावा इसे मध्यस्थता सेवा प्रदाताओं तथा मध्यस्थता पेशेवरों को प्रशिक्षण और प्रमाणन देने वाले संस्थानों को मान्यता देने का भी अधिकार दिया गया है। एटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पिछले वर्ष मध्यस्थता परिषद के गठन में देरी के लिए मानव संसाधनों की कमी और वैधानिक निकायों के लिए उपयुक्त उम्मीदवार तलाशने में आने वाली कठिनाइयों को जिम्मेदार बताया था।
सरकार अदालतों के बाहर वाणिज्यिक, नागरिक और पारिवारिक विवादों के निपटारे के लिए संस्थागत पंचाट और मध्यस्थता को बढ़ावा दे रही है। पंचाट में मामले पर निर्णय दिया जाता है, जबकि मध्यस्थता में दोनों पक्षों के बीच समझौते के जरिए विवाद का समाधान किया जाता है। संस्थागत व्यवस्था, तदर्थ व्यवस्था के विपरीत दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते को बाध्यकारी बनाने में मदद करती है।


