महंगे खाद्य पदार्थों और कच्चे तेल से थोक महंगाई उछली
भारत में थोक महंगाई दर जून में बढ़कर 9.87 प्रतिशत पर पहुंच गई है। मुख्य कारण खाद्य वस्तुओं, कच्चे तेल और ईंधन की कीमतों में वृद्धि है। सरकार ने थोक महंगाई को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जबकि रिजर्व बैंक ने महंगाई के अनुमान को बढ़ाया है।

नई दिल्ली, एजेंसी। देश में आम जनता और कारोबारियों पर महंगाई का बोझ और बढ़ गया है। जून के महीने में भारत की थोक महंगाई दर ढ़कर 9.87 प्रतिशत पर पहुंच गई है। आंकड़ों के मुताबिक, मई में यह महंगाई दर 9.68 प्रतिशत थी। इस बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण खाने-पीने की चीजों, कच्चे तेल और ईंधन की कीमतों में आया भारी उछाल है। सभी आंकड़े सरकार द्वारा हाल ही में शुरू की गई नई 2022-23 आधार वर्ष की सीरीज पर आधारित हैं, जिसने पुराने 2011-12 के आधार वर्ष की जगह ली है। थोक मुद्रास्फीति में यह तेजी पश्चिम एशिया संकट, होर्मुज जलडमरूमध्य की प्रभावी नाकेबंदी और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर उसके असर को दर्शाती है। भारत अपने अधिकतर कच्चे तेल का आयात इसी जलडमरूमध्य के जरिये करता है। थोक मुद्रास्फीति के जून 2026 के आंकड़े पर पेट्रोलियम उत्पादों, खाद्य वस्तुओं, विनिर्मित मूल धातु तथा विनिर्मित रसायन एवं रासायनिक उत्पादों की कीमतों का असर दिखा।
थोक महंगाई के अर्थशास्त्र
देश में थोक महंगाई को लेकर अर्थशास्त्रियों के अनुमानों से थोक महंगाई दर ज्यादा रही। रॉयटर्स द्वारा किए गए अर्थशास्त्रियों के सर्वे में इसके 9.15% तक रहने का अनुमान लगाया गया था। डब्ल्यूपीआई की गणना के लिए आधार वर्ष 2022-23 है।
खाद्य वस्तुओं में मुद्रास्फीति बढ़ी
मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, ईंधन एवं बिजली श्रेणी में थोक मुद्रास्फीति जून में 27.41 प्रतिशत रही, जबकि मई में यह 30.33 प्रतिशत थी। खाद्य वस्तुओं में मुद्रास्फीति जून में बढ़कर 5.49 प्रतिशत हो गई जो मई में 3.60 प्रतिशत थी। गैर-खाद्य वस्तुओं में थोक महंगाई 11.07 प्रतिशत रही जबकि खनिज श्रेणी में यह 9.45 प्रतिशत दर्ज की गई। विनिर्मित उत्पादों की श्रेणी में थोक मुद्रास्फीति मई की तरह जून में भी 7.48 प्रतिशत पर स्थिर रही।
ईंधन, बिजली और दवाएं सस्ती
दवाइयों, औषधीय रसायनों और वनस्पति उत्पादों की कीमतों में गिरावट आई जबकि ईंधन और बिजली का सूचकांक 113.0 से घटकर 111.1 हो गया। खनिज तेलों की सालाना महंगाई दर 46.48 प्रतिशत दर्ज की गई। इसके अलावा बेसिक मेटल्स में महंगाई दर 12.31%, इलेक्ट्रिकल उपकरणों की महंगाई दर 11.03% और टेक्सटाइल्स पर यह दर 10.85% रिकॉर्ड की गई।
रसोई का बजट भी बिगड़ा
ईंधन के साथ-साथ खाने-पीने की चीजें भी महंगी हुई हैं। थोक बाजार में केवल खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर जून में 5.49 प्रतिशत रही. वहीं, कच्चे भोजन और फैक्ट्रियों में बनने वाले डिब्बाबंद खाने को मिलाकर जो 'डब्ल्यूपीआई फूड इंडेक्स' बनता है, उसकी महंगाई दर 6.14 प्रतिशत दर्ज की गई। इसके अलावा, गैर-खाद्य प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई दर भी बढ़कर 11.07 प्रतिशत पर पहुंच गई है। फैक्ट्रियों में बनने वाले उत्पादों की महंगाई दर 7.48 प्रतिशत पर पूरी तरह स्थिर रही, यानी इसमें मई के मुकाबले कोई बदलाव नहीं हुआ। आर्थिक जानकारों का कहना है कि थोक बाजार में कच्चे माल और तेल का महंगा होना आने वाले दिनों में आम जनता की जेब पर भारी पड़ सकता है, क्योंकि जब कंपनियों को कच्चा माल महंगा मिलेगा, तो वे खुदरा बाजार में भी सामान के दाम बढ़ा सकती हैं
आम आदमी पर असर
थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर उत्पादक क्षेत्र पर इसका बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो कंपनियां इसका बोझ उपभोक्ता पर डाल देती हैं। सरकार केवल टैक्स के जरिए थोक महंगाई को नियंत्रित कर सकती है। जैसे कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की थी। हालांकि, सरकार टैक्स कटौती एक सीमा में ही कम कर सकती है। थोक महंगाई में ज्यादा भार मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर जैसे फैक्ट्री से जुड़े सामानों का होता है।
रिजर्व बैंक और आम आदमी की जेब पर इसका क्या असर होगा?
थोक महंगाई का सीधा असर खुदरा महंगाई पर पड़ता है। जून में खुदरा महंगाई दर भी 17 महीने के उच्चतम स्तर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है (जो मई में 3.93 प्रतिशत थी)। आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए अपने महंगाई अनुमान को 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया है, क्योंकि ईंधन की ऊंची वैश्विक कीमतों का असर अब खुदरा पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी दिखने लगा है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम है और आम उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ सकता है।


