रघुनाथपुर थाने को क्रांतिकारियों ने कर दिया था आग के हवाले
महात्मा गांधी ने 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा की, जिससे गांवों में व्यापक असर देखने को मिला। युवाओं और किसानों ने अंग्रेजों को भगा देने के लिए हुंकार भरी। रघुनाथपुर में 1931 में दांडी मार्च के आरोप में कई सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया गया।

शशिभूषण, रघुनाथपुर। 9 अगस्त 1942 को जब महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा देते हुए भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा की तो कुछ ही दिनों में इसका असर गांवों में भी व्यापक तौर पर दिखने लगा। युवाओं में इस आंदोलन ने इतना जोश तो भर ही दिया था, किसानों ने भी अंग्रेजों को भगाने के लिए हुंकार भर दी। अंग्रेज अफसरों और सिपाहियों को लोगों ने जब खदेड़ने की ठान ली तो चहुंओर थाने जलाए जाने लगे।
किसानों का योगदान
अंग्रेजों को भगाने के लिए गांव के किसानों ने भी हुंकार भरी थी। महात्मा गांधी ने जब नमक सत्याग्रह को लेकर 12 अप्रैल 1930 ने दांडी यात्रा शुरू की थी तो यह देश भर में करीब साल तक जारी रहा। रघुनाथपुर जैसे सुदूर क्षेत्र में भी दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह) निकाली गयी। 1931 में दांडी मार्च निकलाने के आरोप में रघुनाथपुर बाजार बच्चा पांडेय, महाराज पांडेय व बनवारी तिवारी समेत कई सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
गिरफ्तारी और प्रतिरोध
दांडी मार्च और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने वाले सेनानियों में 18 का ही प्रखंड कार्यालय परिसर में लगे शिलापट्ट पर नाम है। बनारस राय व रामवचन पांडेय, नवादा गांव के जगरनाथ सिंह, राजमंगल सिंह, सुल्तानपुर गांव के बलभद्र पांडेय व बेलवार के रामदास पांडेय ने रघुनाथपुर थाने पर पथराव कर थानेदार को भागने पर मजबूर कर दिया था। यहां तक कि थाने में भी आग लगा दी गयी। इस आरोप में सभी क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें छपरा जेल भेज दिया गया।


