डीआरडीओ ने अगली पीढ़ी के रडार के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित की
रिपोर्ट :: - इसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों में किया जा सकेगा -

रिपोर्ट :: - इसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों में किया जा सकेगा
- इस गैलियम नाइट्राइड से बनी बहुत छोटी चिप का इस्तेमाल किया गया
नई दिल्ली, एजेंसी। देश ने रक्षा क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने ऐसी स्वदेशी तकनीक विकसित की है, जिसका इस्तेमाल आने वाले समय के रडार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों में किया जा सकेगा।
रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट
रक्षा मंत्रालय की वर्ष 2025-26 की रिपोर्ट के मुताबिक, इस तकनीक की मदद से बहुत तेज गति वाले और ज्यादा ताकतवर संकेत तैयार किए जा सकते हैं। इनका इस्तेमाल रडार, संचार, निगरानी और मानवरहित विमानों जैसी प्रणालियों में होगा। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें गैलियम नाइट्राइड से बनी बहुत छोटी चिप का इस्तेमाल किया गया है। केवल 3.5 गुणा तीन मिलीमीटर आकार की यह चिप 30 वाट तक की शक्ति दे सकती है। यह सामान्य सिलिकॉन चिप की तुलना में करीब 300 गुना ज्यादा तेज काम कर सकती है। डीआरडीओ ने इस तकनीक का इस्तेमाल एक्स बैंड तक के रडार और अन्य प्रणालियों के लिए सफलतापूर्वक करके दिखाया है। इसके अलावा कम शोर में संकेत पकड़ने और मजबूत संकेत भेजने वाले उपकरण भी देश में ही बनाए गए हैं।
दूसरे देशों पर निर्भरता
दर्जा मंत्रालय के अनुसार, इस तकनीक से रक्षा उपकरणों का आकार और वजन कम किया जा सकता है। साथ ही उनकी क्षमता और काम करने की गति बढ़ाई जा सकती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत को ऐसी महत्वपूर्ण तकनीक के लिए दूसरे देशों पर कम निर्भर रहना पड़ेगा। अभी गैलियम नाइट्राइड से जुड़े अधिकांश उपकरण विदेशों से मंगाए जाते हैं।
उपकरणों का सीमित उत्पादन
रक्षा मंत्रालय ने स्वदेशी गैलियम नाइट्राइड और सिलिकॉन कार्बाइड आधारित तकनीक के विकास को अर्धचालक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। स्वदेशी गैलियम नाइट्राइड उपकरणों के विकास के लिए रक्षा क्षेत्र में नवाचार कार्यक्रम के तहत भी काम चल रहा है। इसके तहत अगली पीढ़ी के वायरलेस संकेत भेजने वाले उपकरणों के लिए उन्नत गैलियम नाइट्राइड अर्धचालक विकसित करने का ठेका एक भारतीय कंपनी को दिया गया था।
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स्वदेशी तकनीक से बनेगा देश का पहला हाइड्रोजन आधारित लोहा संयंत्र
-इस संयंत्र में ऐसी ऊर्ध्वाधर भट्ठी इस्तेमाल की जाएगी
कोलकाता, एजेंसी। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के खनिज एवं पदार्थ प्रौद्योगिकी संस्थान की अगुवाई में देश का पहला पूरी तरह हाइड्रोजन आधारित प्रत्यक्ष अपचयित लोहा संयंत्र विकसित किया जाएगा। इस राष्ट्रीय प्रायोगिक परियोजना की लागत 207 करोड़ रुपये होगी।
परियोजना को इस्पात मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय से सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत सरकार 113 करोड़ रुपये की सहायता देगी। बाकी राशि परियोजना में शामिल कंपनियां मिलकर देंगी।
संस्थान के निदेशक रामानुज नारायण ने बताया कि संयंत्र अगस्त 2029 तक तैयार होने की उम्मीद है। इसमें रोजाना 20 टन लोहा बनाने की क्षमता होगी। इसका उद्देश्य भारतीय परिस्थितियों के अनुसार हाइड्रोजन आधारित प्रत्यक्ष अपचयित लोहा तकनीक विकसित करना है। परियोजना में गोदावरी पावर एंड इस्पात, लॉयड स्टील, जिंदल स्टेनलेस और थाइसेनक्रुप इंडस्ट्रीज इंडिया शामिल हैं। टाटा स्टील भी इसमें शामिल होने पर सहमत हो गई है। वैज्ञानिक अन्य बड़ी इस्पात कंपनियों को भी परियोजना से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इस संयंत्र में ऐसी ऊर्ध्वाधर भट्ठी इस्तेमाल की जाएगी, जो पूरी तरह हाइड्रोजन से चल सकेगी। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में मिलने वाले अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता वाले हेमेटाइट अयस्क का इस्तेमाल करना इस परियोजना की बड़ी चुनौती होगी।


