10 साल में दोगुने हुए सफेद दाग के मरीज
बदलती जीवनशैली और मानसिक तनाव के परिणामस्वरूप अलीगढ़ में विटिलिगो (सफेद दाग) के मरीजों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। पिछले दशक में 18 हजार से बढ़कर 29 हजार त्वचा रोगियों में विटिलिगो की हिस्सेदारी 2% से 4.2% तक पहुंच गई है। यथासमय इलाज से मरीजों की स्थिति में सुधार संभव है।

अलीगढ़, वरिष्ठ संवाददाता। बदलती जीवनशैली, बढ़ता मानसिक तनाव, अनियमित खानपान और औद्योगिक प्रदूषण का असर अब लोगों की त्वचा पर साफ दिखाई देने लगा है। अलीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में विटिलिगो (सफेद दाग) के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकारी अस्पतालों, मेडिकल कॉलेज और निजी क्लीनिकों के ओपीडी आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्षों में इस बीमारी के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। चिंता की बात यह भी है कि अब यह बीमारी युवाओं और बच्चों को तेजी से अपनी चपेट में ले रही है।
वर्तमान स्थिति
दीनदयाल उपाध्याय संयुक्त चिकित्सालय, मलखान सिंह जिला अस्पताल, जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज (एएमयू) व प्रमुख निजी त्वचा रोग क्लिनिकों की ओपीडी प्रवृत्तियों के विश्लेषण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। वर्ष 2016 में त्वचा रोग ओपीडी में लगभग 18 हजार मरीजों के बीच विटिलिगो के 360 मामले दर्ज हुए थे। वर्ष 2021 में यह संख्या बढ़कर 675 पहुंच गई, जबकि वर्ष 2026 में लगभग 29 हजार त्वचा रोगियों में 1,218 मरीज सफेद दाग से पीड़ित पाए गए। कुल त्वचा रोगियों में विटिलिगो की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से बढ़कर 4.2 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान में आने वाले कुल मामलों में 60 प्रतिशत से अधिक मरीज 15 से 30 वर्ष आयु वर्ग के हैं। वर्ष 2016 में जहां यह बीमारी मुख्य रूप से 30 से 50 वर्ष आयु वर्ग में देखी जाती थी, वहीं अब किशोर और युवा सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। 2016 की तुलना में युवा मरीजों की संख्या में 45 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों की राय
त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. महेश वार्ष्णेय का कहना है कि विटिलिगो कोई संक्रामक रोग नहीं है। यह एक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली त्वचा को रंग देने वाली मेलानोसाइट कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगती है। बढ़ता मानसिक तनाव, करियर और पढ़ाई का दबाव, औद्योगिक रसायनों के संपर्क व प्रदूषित वातावरण इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि बीमारी से शारीरिक परेशानी कम होती है, लेकिन मरीजों को मानसिक और सामाजिक स्तर पर अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में विवाह, रोजगार और सामाजिक संबंधों पर भी इसका असर पड़ता है। हालांकि शुरुआती पहचान और आधुनिक उपचार पद्धतियों की मदद से इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। समय रहते इलाज शुरू करने पर त्वचा का सामान्य रंग वापस लाने की संभावना भी बढ़ जाती है।


