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हिंदी न्यूज़ देशमहाराष्ट्र से 5 तो बिहार से शून्य; सुप्रीम कोर्ट में राज्यों के प्रतिनिधित्व में संतुलन नहीं, इन स्टेट्स से एक भी जज नहीं

महाराष्ट्र से 5 तो बिहार से शून्य; सुप्रीम कोर्ट में राज्यों के प्रतिनिधित्व में संतुलन नहीं, इन स्टेट्स से एक भी जज नहीं

श्याम सुमन,नई दिल्लीShankar Pandit
Mon, 06 Dec 2021 06:03 AM
महाराष्ट्र से 5 तो बिहार से शून्य; सुप्रीम कोर्ट में राज्यों के प्रतिनिधित्व में संतुलन नहीं, इन स्टेट्स से एक भी जज नहीं

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देश की सर्वोच्च अदालत में सभी राज्यों के जजों का प्रतिनिधित्व नहीं है, इसके कारण सुप्रीम कोर्ट में राज्यों के प्रतिनिधित्व का असंतुलन बना हुआ है। असंतुलन की स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट में किसी राज्य से आने वाले जजों की संख्या पांच तक है, तो किसी राज्य से एक भी जज बेंचों में नहीं हैं। एक तथ्य हमेशा से रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में सबसे ज्यादा जज बंबई हाईकोर्ट के होते हैं। इस समय भी सुप्रीम कोर्ट में बंबई हाईकोर्ट यानी महाराष्ट्र से पांच जज बेंचों में हैं। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट (यूपी) और तमिलनाडु का नंबर रहता है, लेकिन यह बंबई हाईकोर्ट से कभी भी ज्यादा नहीं हुआ।

शीर्ष अदालत में इस समय यूपी से तीन जज हैं। दिल्ली भी इस मामले में पीछे नहीं रहता, दिल्ली से चार न्यायाधीश बेंचों में हैं। इसके साथ राजस्थान से भी दो न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट में हैं। आंध्रप्रदेश, गुजरात, पंजाब एवं हरियाणा, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु हाईकोर्ट से दो दो जज हैं। वहीं, असम और मध्यप्रदेश से एक-एक जज सर्वोच्च अदालत में नियुक्त हैं।

इन राज्यों के जज नहीं : बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, जैसे राज्यों से इस समय एक भी जज सुप्रीम कोर्ट में नहीं हैं। वहीं, मणिपुर, सिक्किम, मेघालय जैसे छोटे हाईकोर्ट से भी कोई न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट में नहीं लाए गए हैं।

जरूरी है क्षेत्रीय संतुलन
जजों की नियुक्ति के ज्ञापन (एमओपी) के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की जिम्मेदारी है कि वह जजों की नियुक्ति के समय राज्यों के प्रतिनिधित्व का ख्याल रखे। चयन इस तरह से हो कि हर राज्य का प्रतिनिधित्व सर्वोच्च अदालत में नजर आए। यह लगभग राज्यसभा में की जाने वाली नियुक्तियों की तरह से होता है, जहां हर राज्य की सीटों का एक कोटा है जिसे हर दो साल बाद होने वाले चुनावों से भरा जाता है।

सीधे बार से भर्ती :
जानकारों के अनुसार, यह क्षेत्रीय असंतुलन पिछले दिनों तब और मुखर हुआ जब कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही प्रैक्टिस करने वाले वकीलों में से जजों को लेना शुरू किया। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले छह वर्षों में बार से चार वकीलों को सीधे जज बनाया है। ये जज किसी राज्य, जैसे दिल्ली के कोटे में नहीं गिने जाते बल्कि स्वतंत्र होते हैं।

लैंगिक प्रतिनिधित्व :
यही स्थिति लैंगिक प्रतिनिधित्व की भी है। पिछले दिनों राष्ट्रपति ने इस मुद्दे को उठाया था और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों को नियुक्त करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में कुल जजों की संख्या एक रिक्ति के साथ 34 है लेकिन इनमें फिलहाल महिला जज चार ही हैं। यदि देखा जाए तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व, उनकी हाईकोर्ट में कुल संख्या जो कि लगभग 66 है, समानुपातिक है। इनमें से एक महिला जज जस्टिस बीवी नागरत्ना देश की मुख्य न्यायाधीश बनने की राह पर हैं, हालांकि उनका कार्यकाल बहुत छोटा होगा।

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