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विनम्र श्रद्धांजलि-चौथी कड़ी:गिरिजा देवी की कहानी उन्हीं की जुबानी-'उस साधु की याद और मेरे आंसू'

Girija Devi

हिन्दुस्तान अखबार में 19 मार्च, 2016 से 16 अप्रैल, 2016 के बीच हर रविवार प्रकाशित हाने वाले कॉलम 'मेरी कहानी' में पांच क​ड़ियों में गिरिजा देवी से बातचीत पर आधारित उनके जीवन से जुड़े कुछ अनछुए पहलू प्रकाशित हुए थे। हम आपके लिए गिरिजा देवी के जीवन से जुड़ी उन कहानियों को पांच कड़ियों में पेश कर रहे हैं। पेश है चौथी कड़ी...

मेरे अप्पा कहलाने के पीछे की कहानी बड़ी मजेदार है। मेरी बहन को बेटा हुआ। खूब गोरा, गोल-मटोल। हम उसको खूब खिलाते थे। उसके साथ बातें करते थे। थोड़ा बड़ा होने पर जब उसने शब्दों को तोड़-मरोड़कर बोलना शुरू किया, तो उसी ने सबसे पहले हमको बुलाया अप्पा। उसके बाद से तो घर में हर कोई अप्पा बुलाने लगा। धीरे-धीरे आसपास के लोगों ने भी अप्पा कहना शुरू कर दिया। अब तो जाने कितने साल से मेरा नाम ही पड़ गया है अप्पा। अब घर के बच्चे अप्पा दादी, अप्पा नानी, अप्पा मां बुलाते हैं, यानी पुकारने वाला रिश्ता चाहे जो हो, उसके साथ अप्पा लगा रहता है। खैर, अपनी गायकी पर लौटती हूं। मैं आजतक यही सोचती हूं कि मेरा गाना-बजाना सब ऋषि-मुनियों की देन ही है। छोटी थी, तब एक साल सारनाथ में रही। सुना था कि सुबह-सुबह ऋषि-महर्षि स्नान के लिए जाते हैं और उनके कानों में गायकी जाती है, तो वे आशीर्वाद देते हैं। मेरे ध्यान में यह था कि इन सबका आशीर्वाद बहुत जल्दी लगता है। मैं पूर्व जन्म में भी विश्वास करती हूं।

मेरे जीवन में एक-दो चमत्कारिक घटनाएं घटीं। दरभंगा के लहेरिया सराय में दुर्गा पूजा पर हमारा कार्यक्रम था।  वहां हमको दो प्रोग्राम करने थे। षष्ठी  और अष्टमी का। वैसे उनका कार्यक्रम सातों दिन चलता है। कार्यक्रम में एक कलाकार नहीं आए। मुझे उनकी जगह गाने के लिए कहा गया। मैंने विनम्रता से मना कर दिया। मैंने कहा कि हम दो दिन के लिए गाने आए हैं, दो दिन ही गाएंगे। एक कलाकार के न आने की वजह से उन्हें अपने तय कार्यक्रम में तब्दीली भी करनी पड़ी थी। अगले दिन वे लोग रात में तीन बजे आए और बोले कि चलिए, आज आपका साढ़े तीन बजे से कार्यक्रम है। हमारी आदत थी कि हम कार्यक्रम के लिए जाने से पहले नहा-धोकर भगवान को धूप-बत्ती दिखाकर, और पूजा करके ही गाने जाते थे। आज तक कभी सोकर उठने के बाद सीधे गाना नहीं गाया। खैर, हम तैयार होकर कार्यक्रम के लिए पहुंचे। तबला और बाकी साज-सामान लेकर। उस कार्यक्रम के लिए तबले पर भी मेरे गुरुभाई ही थे- कामेश्वर नाथ मिश्रा। कार्यक्रम के लिए पहुंचे, तो पूरा पंडाल खाली था। सिर्फ थोडे़-बहुत मजदूर थे, जिन्होंने पंडाल लगाया होगा। बोरा बिछाकर बैठे वे बीड़ी पी रहे थे। तब तक चार बज गए थे। कुल मिलाकर पंडाल में वे मजदूर, हमारे साथी कलाकार और वही चार आदमी, जो हमको बुलाकर ले गए थे, इतने ही लोग थे। मेरे बैठने की जो जगह थी, उसके ठीक सामने दुर्गाजी की बड़ी-सी प्रतिमा थी, एकदम चमकती हुई। बायीं तरफ शंकर जी का घंटा-घडि़याल बजना शुरू  हुआ। मैंने सोचा कि चाहे जितने लोग बैठे हैं, बैठे रहें, मैंने अपनी गायकी शुरू कर दी। 30-35 मिनट का शुरुआती राग गाया, विलंबित ख्याल खत्म करने के बाद मैंने आंखें खोली ही थीं कि देखा तो पूरे पंडाल में सिर्फ सिर ही सिर दिखाई दे रहे हैं। मुझे समझ ही नहीं आया कि यह करिश्मा कैसे हुआ है? इतने लोग अचानक कहां से आ गए? मेरी आंखों में आंसू आ गए। दिल भर आया। किसी तरह थूक निगलकर अपने आपको काबू में किया। फिर द्रुत गाए। फिर वही बाबुल मोरा  गाए। फिर एक भजन... डेढ़ घंटे तक हम गाते रहे। तब तक करीब साढ़े पांच बज गए थे। हमारा गाना खत्म हुआ, तो पूरे पंडाल में खूब तालियां बजीं।

हम जब मंच से उठकर जाने लगे, तो पंडाल में एक साधु आए। गोरा बदन। सफेद दाढ़ी। जनेऊ  लटक रहा था। एक लाल गमछा पहना था और एक लाल गमछा उन्होंने ओढ़ रखा था। हाथ में कमंडल। साधु ने कहा- बिटिया, हमने आज तक ऐसा संगीत नहीं सुना था। तुम यह कमंडल और गमछा ले लो। लेकिन मेरे पिताजी और मां ने समझाया था कि अगर कोई साधु तुम्हारे पास आए, तो उसे अपने पास से कुछ दो, उससे कुछ लो नहीं। मैंने साधु बाबा से कहा कि मुझे सिर्फ आशीर्वाद दीजिए। साधु बाबा ने दोबारा कहा- बिटिया तुम यह कमंडल ले लो। मैंने फिर मना कर दिया। उसके बाद मैंने आंखें मूंद पर्स में हाथ डाला कि जो कुछ मेरे हाथ में आएगा, मैं उनको दे दूंगी, लेकिन जब आंखें खोलीं, तो वह सामने नहीं थे। मैंने साथी कलाकारों से पूछा कि वह साधु बाबा कहां गए? पंडाल में लोगों से मैंने कहा कि वे साधु बाबा को खोजकर लाएं। साधु बाबा कहां उड़ गए, पता ही नहीं चला। मुझे रोना आ गया। सब कहने लगे कि शंकर भगवान आए थे, आपको कुछ देना चाहते थे, आपने लिया ही नहीं। पर हमने तो लेना सीखा ही न था, सिर्फ देना आता था। आज भी उनका चेहरा अच्छी तरह याद है, आज भी मैं उन्हें याद कर रोती हूं।

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  • Web Title:Humble Tribute Fourth Episode The Story of Famous Thumari Singer Girija Devi in Meri Kahani Column of Hindustan