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जानिए कैसे शुरू हुआ #MeToo आंदोलन और कितना है प्रभाव

मी टू (image credits: Deccan Herald)

दुनिया भर में चर्चा चल रहे #मीटू आंदोलन की चपेट में देश के विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर से लेकर बॉलीवुड की तमाम बड़ी हस्तियां आ गईं। इसके चलते एमजे अकबर को अपनी कुर्सी भी गंवानी पड़ी है। इस आंदोलन की वजह से 2018 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी नहीं मिला। तो न्यूयार्क टाइम्स को इसकी वजह से पुलित्जर पुरस्कार मिला। आखिर कैसे इस आंदोलन की शुरुआत हुई और कहां पर हुई। जानेंगे एक नजर में #मीटू का इतिहास...

मी टू आंदोलन अमेरिका से शुरू हुआ जहां यह आंदोलन उन लोगों के विरुद्ध छेड़ा गया जिन्होंने महिलाओं को हिंसा, यौन हिंसा का शिकार बनाया। आज इस आंदोलन की गूंज विश्व भर में सुनाई दे रही है। इस आंदोलन को सोशल मीडिया ने हवा दी। जिस पर कुछ महिलाओं ने यौन उत्पीड़न से संबंधित अपने अनुभव साझा किए। दुनिया भर की तीन करोड़ से भी अधिक महिलाएं इस आंदोलन को बढ़ाने में जुटी हुई हैं।

कैसे हुई शुरुआत
मी टू शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग साल 2006 में दक्षिण अफ्रीका के सामाजिक कार्यकर्ता टराना बुर्क ने यौन हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए किया था और अपील की कि महिलाएं अपने ऐसे अनुभव साझा करें।  2017 में यह आंदोलन के रूप में तब सामने आया जब हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने हॉलीवुड निर्माता हार्वे वाइन्सटीन पर यौन हिंसा के आरोप लगाए। इसके बाद करीब 50 अन्य महिलाओं ने भी उन पर इस तरह के आरोप लगाए और इसके बाद मी टू अभियान बड़े स्तर पर शुरू हो गया। अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि वाइन्सटीन पर 12 महिलाओं ने आरोप लगाए हैं। इस मामले में वाइन्सटीन को गिरफ्तार किया गया और उन्होंने दो महिलाओं से अपने व्यवहार के लिए माफी भी मांगी थी। इसके बाद प्रसिद्ध अभिनेत्री एंजेलिना जोली और जीनिश पैट्रोन ने वाइन्सटीन पर आरोप लगाए। जोली ने कहा था कि हार्वे के साथ काम करने का अनुभव बहुत खराब रहा था। इसलिए उन्होंने उनके साथ कभी काम नहीं करने का फैसला लिया। 

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी लगे आरोप
इस अभियान से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अछूते नहीं रहे। उन पर जेसिका, लीड्स, समांथा हाल्वे और रैकल कूम्स नामक तीन महिलाओं ने आरोप लगाए। जिसके बाद व्हाइट हाउस में ट्रंप ने आरोपों का खंडन किया था।

आंदोलन को मिला टाइम पर्सन ऑफ द ईयर-2017 का खिताब
इस अभियान की सफलता इतनी बड़ी हो गई कि मशहूर पत्रिका टाइम ने वर्ष 2017 में इस आंदोलन को ‘टाइम पर्सन ऑफ द ईयर-2017’ के खिताब से नवाजा था।

मी टू आंदोलन की वजह से मिला पुलित्जर पुरस्कार
वर्ष 2018 में यौन र्दुव्यवहार का खुलासा करने के लिए 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' के पत्रकारों जोडी केंटोर तथा मैगन ट्वोही की रिपोर्ट तथा ‘द न्यूयॉर्कर’ के पत्रकार रोनन फेरो को उनकी रिपोर्टिंग के लिए संयुक्त रूप से दिया गया।

आंदोलन की वजह से नहीं मिल सका साहित्य का नोबेल
इस आंदोलन का इतना प्रभाव रहा कि साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी नहीं मिल सका। हुआ यूं कि पुरस्कार देने वाली स्वीडिश एकेडमी की चयन समिति ने इसकी एक महिला सदस्य के पति पर मी टू आंदोलन के तहत आरोप लगे थे। जिसके बाद 2018 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया। 

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दिल्ली, मुंबई में भी चले इसकी तर्ज पर अन्य आंदोलन
मी टू आंदोलन की तर्ज पर ही मुंबई में मेरी रात, मेरी सड़क और लहू का लगान भी महिलाओं ने चलाए। सैनेटरी पैड पर 12 प्रतिशत कर लगाया गया था, जिसका विरोध भारतीय महिलाओं ने लहू का लगान के द्वारा किया था। वहीं हरियाणा में वर्णिका कुन्डू से छेड़छाड़ होने पर मेरी रात, मेरी सड़क आंदोलन दिल्ली और हरियाणा में चला।

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  • Web Title:how metoo movement got started and what is its impact know here