शौर्य चक्र विजेता शहीद जीदन बागे अपने ही गांव में हैं अपेक्षित
कामडारा प्रखंड के शहीद जीदन बागे की कहानी महत्वपूर्ण है। 27 फरवरी 1991 को पंजाब में आतंकवादी कार्रवाई में उन्होंने अदम्य साहस दिखाया और मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित हुए। उनके परिवार को सरकारी उपेक्षा का सामना करना पड़ा है और गांव में बुनियादी सुविधाओं की कमी है।

कामडारा, शहाब अली। देश की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने वाले वीर जवानों को राष्ट्र हमेशा सम्मान के साथ याद करता है। लेकिन कामडारा प्रखंड के रामपुर पंचायत स्थित टाटी गिरजा टोली निवासी शहीद जीदन बागे की कहानी कुछ अलग है। पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ अभियान में अदम्य साहस दिखाते हुए 27 फरवरी 1991 को शहीद हुए जीदन बागे को मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था। उनकी वीरता की गाथा आज भी किताबों में पढ़ाई जाती है, लेकिन उनका परिवार और गांव आज भी सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहा है।
जीदन बागे का जीवन
जीदन बागे का जन्म 18 जनवरी 1958 को हुआ था। 29 जुलाई 1977 को वे बिहार रेजिमेंट में भर्ती हुए। पंजाब में आतंकवाद के दौर में वे ऑपरेशन रक्षक के तहत तैनात थे। 27 फरवरी 1991 को राजेवाड़ा गांव के गेहूं के खेतों में आतंकवादियों के छिपे होने की सूचना मिली। जीदन बागे कुछ जवानों के साथ वहां पहुंचे और आतंकवादियों को आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी। जवाब में आतंकवादियों ने गोलियां बरसा दीं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद जीदन ने हिम्मत नहीं हारी और आतंकवादियों पर जवाबी कार्रवाई जारी रखी। इस दौरान उन्होंने आतंकियों के कमांडर समेत पांच आतंकवादियों को मार गिराया। अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी वीरता के सम्मान में तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने मरणोपरांत उन्हें शौर्य चक्र प्रदान किया। पंजाब के कपूरथला में उनकी समाधि भी बनाई गई।
परिवार की कठिनाईयाँ
शहीद की पत्नी सुबासी बारला बताती हैं कि पति की शहादत के बाद परिवार की जिम्मेदारी अकेले संभालनी पड़ी। बच्चों की पढ़ाई और परवरिश के लिए उन्होंने गोविंदपुर में घर बनाया। उनकी बेटी मोयलेन बागे आदित्यपुर, जमशेदपुर में सरकारी शिक्षिका हैं, जबकि बेटा अमित बागे आईआरबी लोहरदगा में पदस्थापित हैं। छोटी बेटी निमुंती नौकरी की तैयारी कर रही हैं।
सरकारी उपेक्षा
सुबासी बारला के अनुसार पति की शहादत के बाद सरकार और प्रशासन की ओर से परिवार की सुध लेने की परंपरा नहीं बनी। पुण्यतिथि पर भी उन्हें याद नहीं किया जाता। गांव तक पहुंचने वाली सड़क जर्जर है और ग्रामीण पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। गांव में आज तक शहीद का स्मारक भी नहीं बनाया गया है।
शहीद के प्रति सम्मान
शहीद की पत्नी सुबासी बारला दिल्ली स्थित इंडिया गेट के समीप शहीद स्मारक में दो बार श्रद्धांजलि अर्पित कर चुकी हैं। विभाग के बुलावे पर दिल्ली पहुंचीं सुबासी ने सरकार और प्रशासन के समक्ष गांव के विकास तथा टाटी गिरजा टोली में पति का स्मारक बनाने की मांग रखी। उनका कहना है कि शहीद का सम्मान केवल प्रमाणपत्र और समारोह तक सीमित नहीं होना चाहिए। जिस गांव ने देश को ऐसा वीर सपूत दिया, वहां सड़क, पेयजल और स्मारक जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना ही शहीद के प्रति सच्चा सम्मान होगा।
शहीद जीदन बागे की धरोहर
झारखंड गठन के 26 वर्ष बाद भी शौर्य चक्र विजेता के परिवार की यह पीड़ा कई सवाल खड़े करती है। स्वतंत्रता दिवस पर देश जब अपने वीर सपूतों को नमन करेगा, तब कामडारा का यह परिवार भी उम्मीद करेगा कि सरकार की नजर शहीद जीदन बागे के गांव और परिवार तक पहुंचे।


