वंदे भारत से धड़कता दिल सूरत से अहमदाबाद पहुंचा
स्वदेशी ट्रेन वंदे भारत ने हृदय प्रत्यारोपण के लिए धड़कता दिल सूरत से अहमदाबाद पहुंचाया। यह यात्रा मात्र दो घंटे 35 मिनट में संपन्न हुई। रेलवे ने जीवन बचाने की कड़ी में एक नया अध्याय लिखा है। यह घटना मानवता और सेवा के प्रति कर्तव्य का प्रतीक है।

स्वदेशी ट्रेन वंदे भारत शुक्रवार को ऐतिहासिक पल का गवाह बनी। हृदय प्रत्यारोपण के लिए डोनर का धड़कता दिल वंदे भारत ट्रेन के जरिए सूरत से अहमदाबाद महज दो घंटे 35 मिनट में पहुंचा और एक हृदय रोगी को जीवन देने की रेल यात्रा इतिहास में दर्ज हो गई। भारतीय रेलवे ने एक्स पर पोस्ट में बताया कि उम्मीदों के साथ प्रत्यारोपण के लिए धड़कते दिल को समय पर गंतव्य तक पहुंचा जीवन बचाने की कड़ी में रेलवे ने एक नया अध्याय लिखा है। एक अधिकारी ने बताया कि ट्रेन संख्या 20901 मुंबई सेंट्रल- गांधी नगर कैपिटल वंदे भारत से डोनर के दिल को सूरत से अहमदाबाद पहुंचाया गया। ट्रेन सूरत से सुबह नौ बजकर पांच मिनट पर डोनर के हृदय और डॉक्टरों की टीम के साथ रवाना हुई और 11 बजकर 40 मिनट पर अहमदाबाद पहुंची। हृदय को अहमदाबाद के यूएन मेहता इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी एंड रिसर्च सेंटर पहुंचाने के लिए प्लेटफॉर्म नंबर से ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य बिना किसी बाधा के तय समय में हृदय अस्पताल पहुंचे और प्रत्यारोपण की प्रक्रिया पूरी हो सके。
जीवन के लिए हर पल कीमती
अहमदाबाद मंडल के डीआरएम वेद प्रकाश ने बताया कि ये गर्व का पल है। रेलवे, आरपीएफ और राज्य प्रशासन की संयुक्त कोशिशों की बदौलत ये संभव हो सका है। इस क्षण ने साबित किया है कि रेलवे सफर के साथ जीवन रक्षक मिशन में भी बेहतर काम कर रहा क्योंकि जीवन के लिए हर मिनट कीमती है।
जिम्मेदारी नहीं ये हमारा कर्तव्य
डीआरएम ने कहा कि लोगों का जीवन बचाना सिर्फ हमारी जिम्मेदारी नहीं है बल्कि मानवता और सेवा के प्रति हमारा कर्तव्य है। जीवन रक्षक मिशन में रेलवे, अंग प्रत्यारोपण टीम के सदस्यों, अधिकारियों, पुलिस और अन्य लोगों के सहयोग से ही हर चुनौती को छोटा बना लक्ष्य हासिल किया गया।
एम्स दिल्ली में पहला प्रत्यारोपण
देश में पहले हृदय प्रत्यारोपण की कोशिश फरवरी 1968 में डॉ. पीके सेन ने मुंबई में की थी। तीन अगस्त 1994 को एम्स नई दिल्ली के डॉ. पी वेणुगोपाल के नेतृत्व में हुआ था। इस पूरी प्रक्रिया में 20 डॉक्टरों की टीम लगी थी। हृदय प्रत्यारोपण के बाद मरीज 14 साल तक जीवित रहा।


