झंझारपुर कोर्ट के 46 वर्षों के इतिहास में पहली बार सुनाई गई फांसी
झंझारपुर व्यवहार न्यायालय द्वारा दो बच्चों की हत्या के मामले में फांसी की सजा दी गई है। यह 1981 में न्यायालय की स्थापना के बाद पहला मामला है जिसमें मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है। अधिवक्ता ने इसे समाज का जघन्य अपराध बताया है। दोनों दोषियों को केंद्रीय कारागार में भेजा जाएगा।

झंझारपुर। दो मासूम बच्चों की हत्या के मामले में झंझारपुर व्यवहार न्यायालय द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को अभियोजन पक्ष ने ऐतिहासिक बताया है। विशेष लोक अभियोक्ता के सहयोगी अधिवक्ता जगदीश प्रसाद यादव ने कहा कि वर्ष 1981 में झंझारपुर व्यवहार न्यायालय की स्थापना के बाद, पिछले 46 वर्षों में यह पहला अवसर है जब किसी मामले में मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है। अधिवक्ता ने कहा कि जिस मां पर बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी थी, उसी के द्वारा प्रेमी के साथ मिलकर मासूमों की हत्या करना समाज के सबसे जघन्य अपराधों में से एक है। जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश (द्वितीय) अभिषेक रंजन ने इसे 'रेयर ऑफ रेयरेस्ट' की श्रेणी में रखते हुए बिल्कुल सही व कठोरतम फैसला दिया है。
दोषियों का स्थानांतरण
न्यायालय के आदेश के बाद दोनों दोषियों (अनीता देवी और जयप्रकाश मंडल) को झंझारपुर उपकारा से किसी केंद्रीय कारागार (सेंट्रल जेल) में स्थानांतरित किया जाएगा। नियमों के अनुसार उपकारा में पांच वर्ष से अधिक सजा पाने वाले बंदियों को रखने का प्रावधान नहीं है।
पटना हाईकोर्ट से होगी फैसले की पुष्टि
कानूनी प्रक्रिया के अनुसार, फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद संबंधित आदेश, निर्णय और केस से जुड़े सभी दस्तावेज पुष्टि के लिए पटना हाईकोर्ट भेजे जाते हैं। न्यायालय की ओर से सभी आवश्यक दस्तावेज विशेष दूत के माध्यम से हाईकोर्ट भेजे जा रहे हैं। हाईकोर्ट की मुहर लगने के बाद ही मृत्युदंड के आदेश पर आगे की अंतिम कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।


