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उसकी तलाश...

अभिमन्यु अनत

वैश्विक स्तर पर हिन्दी की अलख जगाने वाले मॉरीशस के प्रख्यात प्रवासी भारतीय साहित्यकार अभिमन्यु अनत का बीते दिनों निधन हो गया। भारत के बाहर हिन्दी के प्रसार में उनकी भूमिका अहम रही है। मॉरीशस के इस ‘उपन्यास सम्राट' के साहित्य के मूल में शोषण, दमन और बेरोजगारी का प्रतिकार है। वहां की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित उनका उपन्यास ‘लाल पसीना' उनके लेखन का ऐसा टर्निंग प्वाइंट है, जिसने उन्हें हिन्दी के वृहद संसार में बड़ी प्रतिष्ठा दिलाई। कम महत्वपूर्ण नहीं था कि फ्रांसीसी और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की धूर्तता के बयान इस उपन्यास की भूमिका नोबेल पुरस्कृत फ्रेंच लेखक जेएमजी ले क्लेज्यो ने लिखी, जो अपने आप में महत्वपूर्ण है। प्रस्तुत है इसी उपन्यास और क्लेज्यो की लंबी भूमिका के अंश-.

पुष्पा कुएं पर पानी के लिए गई हुई थी। बहुत देर से फूलवंती पगडंडी की ओर आंखें किए हुए थी। सामने की यह पगडंडी हर समय उसके लिए निराशा लिए होती। बहुत देर बाद कुंदन लौटता दिखाई पड़ा। उसने अपनी कुदाली को कंधे से उतारा ही था कि फूलवंती ने कहा, देवननन् भैया, अपन को एक बात पूछनी है।

कुंदन बिना कुछ कहे उसके पास आकर चबूतरे पर बैठ गया। थकान से उसका चेहरा छोटा दीख रहा था। अपने हाथों की मिट्टी को अंगुलियों से मलकर छुड़ाते हुए उसने फूलवंती की ओर देखा। फूलवंती जिस प्रश्न के साथ तीन दिन से तैयार थी, आखिर उसे पूछके रही।

भैया! ऊ तोहरा मिलल रहल ना?

कौन?

फूलवंती प्रश्न के लिए तैयार नहीं थी, इसीलिए उत्तर देने में उसे देर हुई... पुष्पा के बाप।

कुंदन ने भी बात समझने के लिए कुछ समय लिया, फूलवंती के चेहरे का वह विचित्र भाव देखा और उसके उत्तर को प्रश्न में बदल दिया, पुष्पा के बाप?

हव धोती...। वह अपनी बात पूरी न कर सकी।

कुंदन ने एक झटका-सा अनुभव किया। चारदीवारी के वे दृश्य अनायास आंखों के सामने दौड़ गए। मंगरू की कई बातें याद आईं। वर्तमान से कटकर वह बीते हुए उन क्षणों में खो गया, जिनसे वह भाग आया था। उसे इतने बड़े संयोग की उम्मीद नहीं थी और फिर चारदीवारी के सभी क्षणों से तो उसने अपने को काट लिया था। मंगरू की याद के साथ-साथ सभी यादों को उसने मिट जाने दिया था। कुंदन तो चारदीवारी के भीतर टूट गया था। वह तो अब देवननन् था। पर एकाएक यह बिजली कैसे कौंध गई! वह एक बार फिर कुंदन कैसे हो गया था? कुंदन के वे पिछले क्षण उसकी धमनियों में फिर से ताजे कैसे हो गए? उसके कानों में फूलवन्ती की भर्राई हुई आवाज आई, भैया! 

एक खुद्गर्ज खयाल से कुंदन कांप-सा गया - फूलवन्ती का यह जान लेना कि मैं कैद से भाग आया हूं, कहां तक मेरे रहस्य को रहस्य रहने देगा?

फूलवन्ती के इस प्रश्न ने कुंदन के खुद्गर्ज खयाल को झकझोर दिया। उसका वह प्रश्न उसके कानों में गूंजता रहा। उस गूंज की कई अनुध्वनियां उसके हृदय और कानों के बीच के तारों से होती रहीं - वह कैसा है? मंगरू वहां कैसा है? कैसा है वह?

भीतर-ही-भीतर के लम्बे तर्क के बाद कुंदन ने अन्त में यही तय किया कि चारदीवारी के भीतर की सच्चाई उसकी अपनी सच्चाई थी। वहां की यंत्रणा और वेदना को उसे किसी से बांटना नहीं था। झूठ अगर आदमी को पीड़ा के बीच भी एक स्थायी आनन्द दे जाए तो उससे हर्ज ही क्या था! दुख के बीच सच्चाई का एक दूसरा दुख जोड़ देने से तो उसने इसी को बेहतर समझा कि झूठ का आनन्द वर्तमान की पीड़ा को मिटा सके। झूठ पर पश्चाताप नहीं हुआ - और फिर चारदीवारी से बाहर तो हर हालत में आदमी अच्छा ही होगा। उसका वह झूठ उतना बड़ा झूठ भी तो नहीं था। मंगरू चारदीवारी के भीतर नहीं था। यह सच्चाई थी...और यह भी झूठ नहीं था कि वह उस नर्क से पीडि़त नहीं था।

रात कुंदन के लिए तनाव से भरपूर रही। उसने अपने-आपको भावुकता से काटकर किसी उद्देश्य के लिए कठोर बनाया था, पर वही भावुकता एकाएक उसे जकड़ गई थी। फूलवंती और पुष्पा पर तरस खाता रहा। और जब उसने अपने को उससे बचाना चाहा तो हरबसिया की अनचाही याद उसे चुभ उठी। अपने भीतर की बची-खुची भावुकता को मारकर ही उसने उस दिन ईख के खेत की तन्हाई में हरबसिया को अपने पास से खदेड़ दिया था। वह संवेदना अभी उसके भीतर मरी नहीं थी। उसका रूप चाहे कुछ भी हो, पर वह जीवित थी। वह भीतर-ही-भीतर चाहता रहा कि अगर पुष्पा इस समय सामने आ जाती तो वह एक बार जोर से ‘बेटी' चिल्लाकर उसे अपने गले से लगा लेता। मंगरू की बेटी उसके लिए किसी पराये की नहीं हो सकती। कैद में मंगरू और वह एक जीव की तरह थे। कई दारुण दंडों को दोनों ने एकसाथ झेला था।

रात गहरी नींद में अचेत थी। बाहर हलकी बारिश शुरू हो गई थी। कोई दूसरा अवसर होता तो उसका वह कराहता संगीत कुंदन के लिए लोरी बन जाता। लोरियों की वह अधमिटी यादें, जो अब भी उसके भीतर थीं। वे उसके लिए नहीं गाई जाती थीं, फिर भी वे उसके भी काम आ जातीं। उस समय वह पांच वर्ष पार कर चुका था। पड़ोस के नाते में वह उसकी भौजी लगती थी, जो अपने सुरीले स्वर से अपने बच्चे को सुलाया करती थी। कई अवसरों पर कुंदन भी उन गीतों को सुनता हुआ जंभाई लेने लग जाता।

उन दूर हो गए क्षणों के बाद वह हलकी बारिश का संगीत ही होता जो उसकी आंखों को झपकियां दे जाता। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता। आज भी नहीं हुआ। मन-ही-मन बाहर के माहौल का खयाल करता हुआ वह करवटें लेता रहा। हरबसिया रेमों साहब की रखैल थी, इस बात का उसे हमेशा दुख हुआ था। वह अपने-आपसे पूछता रह जाता कि आखिर उसे रेमों साहब की रखैल बनने की क्या आवश्यकता थी! खुद हरबसिया से इसका उत्तर जानने का साहस उसे कभी नहीं हुआ। 

बस्ती के लोगों को यह बात उतनी नहीं खटकती थी, क्योंकि कई अवसरों पर हरबसिया लोगों को रेमों साहब से मिलवाकर उनकी सजाओं को कम करवा चुकी थी। कुन्दन को यह बात भी पसन्द नहीं थी। रियायत से उसे घृणा थी। वह भी शोषक की रियायत से।

उसे कई बातेंयाद आईं। वर्तमान से कटकर वह बीते हुए उन्हीं क्षणों में खो गया, जिनसे वह भाग आया था। उसे इतने बड़े संयोग की उम्मीद नहीं थी और फिर चारदीवारी के सभी क्षणों से तो उसने अपने को काट लिया था।

इतिहास नहीं शोषण-दमन के आख्यान का लेखक

जे़ एम. जी़ ले क्लेज्यो, नोबल पुस्कार विजेता, फ्रेंच लेखक की भूमिका के अंश

अफ्रीकी दासों की यातनाओं के बाद भारतीय मजदूरों के साथ गोरे जमींदारों की क्रूरता जारी रही, गोया ‘ये भारतीय मजदूर आदमी नहीं थे'। ये लोग सिर्फ औजार समझे गए, बल्कि गोरे जमींदारों की रखवाली करनेवाले कुत्ते। मालिकों के सरदारों को मौत छोड़कर हर तरह की सजा और अत्याचार की छूट थी। अभिमन्यु अनत का उपन्यास ‘लाल पसीना' इसी अमानवीयता का बयान है। यह बताता है कि ‘कानूनों' का पालन न करने वालों का कैसे जानवर की तरह पीछा करके गोरे मालिक के दरिन्दे पकड़कर लाते थे। बेबस मजदूर न शादी कर सकते थे, न जमीन का कोई टुकड़ा रखने की इजाजत थी। अपनी भाषा-अपने धर्म का भी अधिकार नहीं था। बच्चों को पढ़ाने का अधिकार भी नहीं। यह इजाजत भी नहीं कि कहीं इकट्ठे हो सकें। .

यही जालिम दुनिया, यूरोप में भी तुक-छिपकर जमींदारी का वही सामंती खेल खेलती रही। अभिमन्यु इस उपन्यास में उसी घिनौने खेल का पर्दाफाश करते हैं। वे इसमें हमें एक महाकाव्य की यात्रा करवाते हैं। उनके पात्र भाववाचक और निरपेक्ष हैं। वे हमें हाड़-मांस के उन सहज व्यक्तियों से मिलाते हैं जो भावनाओं से भरे हैं़, द्विविधा भी लिए हैं, भय और क्रोध भी है और इच्छाएं भी। इस निर्दयी दुनिया में उनके पास एक ही सहारा है, और वह है उनकी क्षति और उनका धर्म, जो उन्हें अपनी मौलिक पहचान और पूर्वजों के स्वाभिमान से जोड़े रखता है।.

अभिमन्यु अनत उन मूल्यों को रेखांकित करते हैं जो भारत की शक्ति रही है। उनके उपन्यास के रूप में आई यह यह गाथा उन लोगों की है जिन्होंने अपने हाथों धरती को आकार दिया और सींचा अपने पसीने की बूंदों से। अनत के पात्र अपने द्वीप से जुड़े लोग हैं और यह द्वीप उनकी विरासत है क्योंकि वे लोग यहां दर्द के साथ पहुंचे थे और यहां आकर उन्होंने राम के धनुष को थामा। बहुतों के लिए यह वही भूमि है जहां वे जनमे और जहां मरेंगे-उनका कैदखाना-उनका एकमात्र भविष्य। पूंजीपति जमींदारों के साथ के उनके संघर्ष महज एक वर्ग विशेष का संघर्ष नहीं, न ही सामाजिक शक्ति का विघटन। यह तो एक बहुत ही धीमा और कठिन विद्रोह है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है और जिसमें समाहित है पुरुषों का क्रोध और नारियों की शक्ति और प्यार।.

इस उपन्यास में मिथक की गहराई है। जहां-तहां लोकगीत, मुहावरे, लम्बे संवाद एक भारतीय ऑपेरा की रचना करते हैं। इसे पढ़ते हुए हमें कभी-कभी रोजाना के भय, कभी हंसी, कभी आधुनिक जीवन की बेदर्दी का एहसास होता है और ऐसी नाजुक घडि़यों का भी जब किसान सपने में नदी किनारे बैठे चिडि़यों के गाने सुनता है, कभी खूबसूरत सत्य के साथ गन्ने के खेतों के बीच भीगी जमीन पर पार करता है। कभी मजदूरों के गड़ासे पर धूप की चमक के साथ क्रोध का उफन उठना और खून का धरती पर बहना एकदम मेक्सिको के गन्ना काटने वाले मजदूरों की तरह। .

इस उपन्यास में प्राचीन भारतीय संगीत की सी धुन है और रामायण की कथा सी रोचकता। अभिमन्यु अनत का यह उत्कृष्ट उपन्यास एक मधुर गान है, अतीत की गहराई लिये हुए जो कि मॉरिशस के यथार्थ को एक नई चेतना प्रदान करता है। (राजकमल प्रकाशन से साभार)

मरिशस के प्रवासी भारतीय हिंदी कथाकार और कवि अभिमन्यु अनत (9 अगस्त, 1937 - 4 जून 2018) ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मॉरिशस में न केवल प्रवासी भारतीयों की अस्मिता को नई पहचान दी, बल्कि वहां भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा व साहित्य का प्रचार-प्रसार भी किया। उनकी करीब 55 पुस्तकें प्रकाशित हैं। प्रमुख किताबें हैं-.

उपन्यास : लाल पसीना, गांधीजी बोले थे, और नदी बहती रही, एक बीघा प्यार। 

कहानी-संग्रह : खामोशी के चीत्कार। 

कविता-संग्रह : नागफनी में उलझी सांसें।

नाटक : देख कबीरा हांसी।

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